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पर्वत प्रदेश में पावस / सुमित्रानंदन पंत

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रचनाकार:सुमित्रानंदन पंत


~*~*~*~*~*~*~*~~*~*~*~*~*~*~*~


पावस ऋतु थी, पर्वत प्रदेश,

पल-पल परिवर्तित पकृति-वेश।


मेखलाकर पर्वत अपार

अपने सहस्‍त्र दृग-सुमन फाड़,

अवलोक रहा है बार-बार

नीचे जल में निज महाकार,


-जिसके चरणों में पला ताल

दर्पण सा फैला है विशाल!


गिरि का गौरव गाकर झर-झर

मद में लनस-नस उत्‍तेजित कर

मोती की लडि़यों सी सुन्‍दर

झरते हैं झाग भरे निर्झर!


गिरिवर के उर से उठ-उठ कर

उच्‍चाकांक्षायों से तरूवर

है झॉंक रहे नीरव नभ पर

अनिमेष, अटल, कुछ चिंता पर।


उड़ गया, अचानक लो, भूधर

फड़का अपार वारिद के पर!

रव-शेष रह गए हैं निर्झर!

है टूट पड़ा भू पर अंबर!


धँस गए धरा में सभय शाल!

उठ रहा धुऑं, जल गया ताल!

-यों जलद-यान में विचर-विचर

था इंद्र खेलता इंद्रजाल

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