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पसे-मर्ग मेरे मजार पर / ज़फ़र

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लेखक: बहादुर शाह ज़फ़र

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पसे-मर्ग मेरे मजार पर जो दिया किसी ने जला दिया ।

उसे आह! दामने-बाद ने सरेशाम ही से बुझा दिया ।।


मुझे दफ़्न करना तू जिस घड़ी, तो ये उससे कहना कि ए परी,

वो जो तेरा आशिक़े-जार था, तहे ख़ाक उसको दबा दिया ।


दमे-ग़ुस्ल से मेरे पेशतर उसे हमदमों ने ये सोचकर,

कहीं जावे उसका दिल दहल, मेरी लाश पर से हटा दिया ।


मेरी आँख झपकी थी एक पल, मेरे दिल ने चाहा कि उसके चल,

दिले बेक़रार ने ओ मियाँ! वहीं चुटकी लेके जगा दिया ।


मैंने दिल दिया, मैंने जान दी, मगर आह तूने न क़द्र की,

किसी बात को जो कभी कहा, उसे चुटकियों से उड़ा दिया ।

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