पहचान / अज्ञेय
विकिपीडिया, एक मुक्त ज्ञानकोष से
|
रचनाकार: अज्ञेय | |
|
संग्रह का मुखपृष्ठ: आँगन के पार द्वार / अज्ञेय |
तुम वही थीं :
किन्तु ढलती धूप का कुछ खेल था-
ढलती उमर के दाग़ उसने धो दिये थे।
भूल थी
पर
बन गयी पहचान-
मैं भी स्मरण से
नहा आया।
