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पांचों घी में / नईम

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लेखक: नईम

~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~

उनकी

टेढ़ी या सीधी हों,

लेकिन हैं पांचों ही घी में


रहे छीजते अपने ही ग्रह,

और नखत ये धीमें धीमें

जिसको जो भी मिला ले उड़े, खुरपी टेढ़े बेंट आ जुड़े

होना था जिनको आधा वो एक रात में हुए डेवढ़े

होने को-

क्या शेष रह गया

कर लो जो भी आये जी में


मान-मूल्य सब हुये तिरोहित, सब ही अपने हुये पुरोहित

पन्नों में ही लिखे रह गये, शुभ की सायत और महूरत

धरे रह गये

मयनोशी के

अदब-कायदे और करीने


अपने राम पड़े सांसत में, कहां रहें अब, किस भारत में?

एक एक से बढ़कर प्राणी, जगह पा गये हैं गारद में

फर्क नहीं-

कर पाता हूं मैं,

अपने लेखे ग़लत सही में

उनकी क्या पूछो हो साधो!

जिनकी हैं पांचों ही घी में।

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