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पीड़ा को विश्व का साम्राज्य दो / रमा द्विवेदी

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 रचनाकार: रमा द्विवेदी                 

जाओ हवाओ देश प्रिय के, विरह के गीत गाओ तुम,
जाओ घटाओ जाओ जाओ, विरहाग्नि न भड़काओ तुम।

इस विरह के ताप से जर-जर के मैं ठठरी भई,
श्वास यूँ तो चल रही पर श्वास अनगिन चुक गई।
झर रहे हैं अश्रु आँखों से उन्हें बतलाओ तुम॥

दिन-रात में अन्तर नहीं इक से मुझे दोऊ लगे,
दिन में अँधेरी रात है और रात में तारे गिने।
मेघों ने पी चाँदनी ली, चाँद को बतलाओ तुम॥

गीली-सुलगती लकड़ी सी यह रात भी जल गई,
रात से सुबह हुई फिर शाम में वो ढल गई।
जल रहा है तन-बदन प्रिय को जरा बतलाओ तुम॥

इस विरह की अग्नि में देखो दिवाकर जल गया,
चांद झुलसा, श्वेत बादल आज काला पड़ गया।
कर रहा पीऊ-पीऊ पपीहा स्वाति-घन बरसाओ तुम॥

इस विरह की पीड़ा को तुम विश्व का साम्राज्य दो,
सब जुड़े बस दर्द से तब मानव का कल्याण हो।
साथ सब रोएँ-हँसे सबको जरा समझाओ तुम॥

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