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पीर मेरी, प्यार बन जा ! / गोपालदास "नीरज"

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कवि: गोपालदास "नीरज"

~*~*~*~*~*~*~*~

पीर मेरी, प्यार बन जा !

लुट गया सर्वस्व, जीवन,

है बना बस पाप- सा धन,

रे हृदय, मधु-कोष अक्षय, अब अनल-अंगार बन जा !

पीर मेरी, प्यार बन जा !


अस्थि-पंजर से लिपट कर,

क्यों तड़पता आह भर भर,

चिरविधुर मेरे विकल उर, जल अरे जल, छार बन जा !

पीर मेरी, प्यार बन जा !


क्यों जलाती व्यर्थ मुझको !

क्यों रुलाती व्यर्थ मुझको !

क्यों चलाती व्यर्थ मुझको !

री अमर मरु-प्यास, मेरी मृत्यु ही साकार बन जा !

पीर मेरी, प्यार बन जा !

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