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प्रधानमंत्री के कमांडो / पवन करण

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CHANDER

इस कदर बेमतलब रहना सिखाया जाता है उन्हें

कि प्रधानमंत्री को हमेशा घेरे में लिये रहते

उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होता

प्रधानमंत्री जनता से क्या कह रहे हैं

जिस वक्त प्रधानमंत्री बोले जा रहे होते हैं

कमांडो अपनी बिल्लौट निगाहों से लगातार

देख रहे होते हैं हमें इधर उधर


पेट से बाहर आने को व्यग्र वायु और

मुंह से बाहर छलांग मारने को बेताब हंसी

रोक पाना कितना कठिन होता है

यह कोई पदोड़ और हंसोड़ से पूछे

प्रधानमंत्री के सुनाये जिस चुटकुले पर जनता

मुंह फाड़ कर हंस रही होती है

उसे सुन कर कमांडो के चेहरे पर हंसी तो क्या

मुस्कान की हल्की सी लकीर भी नहीं उभरती


प्रधानमंत्री के पढ़े किसी शेर पर जब सब

दे रहे होते हैं दाद उनके होंठ कसे हुए होते हैं

प्रधानमंत्री की किसी घोषणा पर तालियों की

गड़गड़ाहट में शामिल होने

उनके हाथों की उंगलियां हिलती तक नहीं

वे हमें इतने निरपेक्ष दिखाई देते हैं कि हमें लगता है

वे कभी प्रधानमंत्री के आगे अपने भतीजे की

नौकरी की दरखास्त तक रखने की नहीं सोचते होंगे

हम अपने प्रधानमंत्री को हमेशा उन्हीं से घिरे

किसी परियोजना का शिलान्यास करते

किसी सेमीनार में दीप प्रज्ज्वलित करते या फिर

किसी पुल का उद्घाटन करते देखते हुए सोचते हैं

कमांडो के रहते हमारे प्रधानमंत्री की जान

सुरक्षित है एकदम , कि प्रधानमंत्री को हरदम

घेरे रहते वे कितने चुस्त दुरस्त ,

सजग , चौकस और आश्चर्यजनक फुर्तीले हैं


कमांडो से घिरे हमारे प्रधानमंत्री हमें देख कर

मुस्कराते हुए दूर से हाथ हिलाते हैं , हम भी

उन्हें अपनी तरफ हाथ हिलाते देख उनकी तरफ

जोर जोर से हिलाते हैं अपने हाथ , मगर जैसे ही

अपने प्रधानमंत्री से हम हाथ मिलाने की कोशिश करते हैं

कमांडो हम पर पिस्टल तान लेते हैं


हरदम प्रधानमंत्री को घेरे रहने वाले ओर

जरा सी बात पर हम पर गोली दाग देने के लिये तैयार

कमांडो से हमें डर लगता है , क्या हरदम

कमांडो से घिरे रहने वाले और हमारी तरह ही निहत्थे

प्रधानमंत्री को कभी उनसे डर नहीं लगता ?


हम दूरदराज बैठे कमांडो से घिरे अपने प्रधानमंत्री को

भारी भरकम प्रतिनिधि मंडल के साथ

विदेश यात्रा पर जाते देखते हैं

प्रतिनिधि मंडल में वही लोग शामिल होते हैं

जो प्रधानमंत्री से हाथ मिलाने में हो चुके होते हैं कामयाब

हम अपने खाली हाथ अपनी जेबों में घुसेड़े

कमांडो की तनी हुई पिस्टल को करते हुए याद

प्रधानमंत्री को हवाई जहाज में चढ़ने से पहले

मंत्रिमंडल के साथियों से फूल ग्रहण करते देखते हैं


प्रधानमंत्री एक एक कर सबसे मुस्कराते

किसी किसी से थोड़ी थोड़ी बात करते

फूल लेते जाते हुए हवाई जहाज पर चढ़ने के लिये

लगी सीढ़ी तक बढ़ते जाते हैं

प्रधानमंत्री को मिलते जा रहे फूलों को

प्रधानमंत्री के साथ साथ आगे बढ़ रहे

कमांडो करते जाते हैं खुद के हवाले


विदेश यात्रा पर जाते प्रधानमंत्री को फूल देने वालों में

मंत्रिमंडल में शामिल वह बुजुर्ग मंत्री भी होता है

जो प्रधानमंत्री को प्रधानमंत्री मानता ही नहीं

जो सरकार में नम्बर दो या

अगला प्रधानमंत्री माना जाता है जो ठीक

प्रधानमंत्री के बगल वाले घर में रहता है

और रोज सुबह सोकर उठते ही

प्रधानमंत्री के घर में पत्थर फेंकता है

और प्रधानमंत्री के वे कमांडो भी उससे

कुछ नहीं कह पाते जो प्रधानमंत्री से हाथ मिलाने की

कोशिश करने पर हमारी तरफ पिस्टल तान लेते हैं

प्रधानमंत्री न चाहते हुए भी उससे हंस कर

फूल ग्रहण करते हैं , वह न चाहते हुए भी

प्रधानमंत्री को फूल भेंट करता है

प्रधानमंत्री अपने प्रति उसकी आंखों में

तिरस्कार और उसके होठों पर

कुटिल मुस्कान साफ देखते हुए भी

उससे नहीं कह पाते कि जाइए नहीं लेने

मुझे आपसे फूल और सुनिए आगे से आप कभी

इस मौके पर आना भी नहीं मुझे छोड़ने

कमांडो इनका चेहरा नहीं दिखना चाहिए मुझे

आज के बाद , तुम्हें पता नहीं ये महाशय

मुझे हटा कर खुद प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं


प्रधानमंत्री के कमांडो प्रधानमंत्री और उसे फूल लेते देते

देख कर बने रहते हैं सपाट , उसे लेकर

प्रधानमंत्री की इच्छा को नहीं बनने देते वे अपनी इच्छा

मगर इस बात को याद कर

पेशाबघर में पेशाब करते हुए वे मुस्कराते जरूर हैं।


दूरदराज बैठे हम सोचते हैं हमारे प्रधानमंत्री

उन कमांडो से जिनसे वे हमेशा घिरे रहते हैं

ठीक उसी तरह कभी हंसी मजाक करते हैं

जैसे वे पत्राकारों से करते हैं

कभी हमने उन्हें किसी कमांडो से बात

करते देखा तो नहीं चलो प्रधानमंत्री की छोड़ो

क्या कभी प्रधानमंत्री को खाली पाकर

उन्हें चारों तरफ से घेर कर चलते कमांडो ही उनसे

किसी बात पर बात करने की करते हैं कोशिश


क्या प्रधानमंत्री किसी कमांडो के बीमार पड़ जाने पर

साथी कमांडो से उसका हाल पूछते हैं ,

उसके लौटने पर उससे कहते हैं

क्यों क्या हो गया था तुम्हें अब तो ठीक हो न ,

हम जैसे दफ्तर के बाबुओं के यहां

जैसे हमारे साहब चले आते हैं क्या प्रधानमंत्री भी

किसी कमांडो की बेटी की शादी में

लिफाफा लेकर पहुंच जाते हैं

क्या कोई कमांडो भी इस तरह की इच्छा रखता है

कभी प्रधानमंत्री अपने काफिले को रोक कर पूछें

अरे रमेश तुम्हारा घर तो इसी सड़क पर है न

चलो आज तुम्हारे घर चल कर चाय पीते हैं


प्रधानमंत्री क्या उन सभी कमांडो

जो उन्हें हमेशा घेरे रहते हैं के नाम जानते हैं

उन्हें पानी चाहिए होता है तो किसी

कमांडो की तरफ देख कर वे सिर्फ पानी कहते हैं

या रणवीर पानी तो लाओ कहते हैं


और तो और वे कमांडो प्रधानमंत्री के इर्द गिर्द

कहां कहां घेरा बनाये रहते हैं

क्या उस जगह के बाहर दरवाजे पर भी

जिसमें हमारे बुजुर्ग प्रधानमंत्री के पायजामे की गांठ

अक्सर देर तक खुलती नहीं है तब क्या

प्रधानमंत्री उसे खोलने उन्हीं में से

किसी एक को आवाज देकर बुलाते हैं


कमाल है कि अपने प्रधानमंत्री को तो हमने

अक्सर ऊंघते , सोते, उबासी लेते देखा है

मगर प्रधानमंत्री को घेरे रहते कमांडो को हमने आज तक

छींकते , खुजाते, नाक में उंगली मारते नहीं देखा


हम सोचते है हमारे प्रधानमंत्री कभी अपने कमांडो से

हमारे बारे में भी बात करते होंगे

क्या वे कभी उनसे कहते होंगे जहां तक

जनता पर तुम्हारे बंदूक तान लेने की बात है

वो तो ठीक है मगर मेरा तुमसे अनुरोध है

कभी उन पर गोली मत चला देना।

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