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फुहारों वाली बारिश / नागार्जुन

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रचनाकार: नागार्जुन

~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~


जाने, किधर से

चुपचाप आकर

हाथी सामने लेट गए हैं,

जाने किधर से

चुपचाप आकर

हाथी सामने बैठ गए हैं !

पहाड़ों-जैसे

अति विशाल आयतनोंवाले

पाँच-सात हाथी

सामने--बिल्कुल निकट

जम गए हैं

इनका परिमण्डल

हमें बार-बार ललचाता रहेगा

छिड़ने-छेड़ने के लिए

सदैव बुलावा देता रहेगा !


लो, ये गिरी-कुंजर

और भी विशाल होने लगे !

लो, ये दूर हट गए,

लो, ये और भी पास आ रहे,

लो, इनका लीलाधरी रूप

और भी फैलता जा रहा,

लेकिन, ये गुमसुम क्यों हैं ?

अरे, इन्होंने तो

ढक लिया अपने आपको

हल्की-पतली पारदर्शी चादरों से

झीने-झीने, 'लूज'

झीनी-झीनी, लूज बिनावटवाली

वो मटमैली ओढ़नी

बादलों को ढक लेगी अब

अब फुहारोंवाली बारिश होगी

बड़ी-बड़ी बूँदें तो यह

शायद कल बरसेंगे...

शायद परसों...

शायद हफ़्ता बाद...


1984 में रचित

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