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फूलों की पाठशाला / तारादत्त निर्विरोध

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 रचनाकार: डा तारादत्त निर्विरोध                 

खुली पाठशाला फूलों की

पुस्तक-कॉपी लिए हाथ में

फूल धूप की बस में आए


कुर्ते में जँचते गुलाब तो

टाई लटकाए पलाश हैं,

चंपा चुस्त पज़ामें में है -

हैट लगाए अमलताश है ।


सूरजमुखी मुखर है ज़्यादा

किंतु मोंगरा अभी मौन है,

चपल चमेली है स्लेक्स में

पहचानों तो कौन-कौन है ।


गेंदा नज़र नहीं आता है

जुही कहीं छिपाकर बैठी है,

जाने किसने छेड़ दिया है -

ग़ुलमोहर ऐंठी-ऐंठी है ।


सबके अपने अलग रंग हैं

सब हैं अपनी गंध लुटाए,

फूल धूप की बस में आए -

मुस्कानों के बैग सजाए ।

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