पुराने अवतरण Report a problem
पन्ना बदलें संवाद

बर्फ के परवत पिघलते जाऍंगे / विजय वाते

From Hindi Literature

यहां जाईयें: नेविगेशन, ख़ोज

कविता कोश की स्थापना के दो वर्ष पूरे!   दो वर्ष की उपलब्धियाँ    |     रचनाकारों की टिप्पणियाँ    |     अपनी टिप्पणी दीजिये


 रचनाकार: विजय वाते                 

बर्फ के परवत पिघलते जाऍंगे ।
बात कीजे हल निकलते जाऍंगे ।

धूप के लिक्‍खे को जल्‍दी बॉंचिये ।
बारिशों में हर्फ घुलते जाऍंगे ।

अवसरों में मुश्किलें मत देखिये ।
हाथ से अवसर निकलते जाऍंगे ।

मुश्किलों में देखिये अवसर नये ।
रास्‍ते खुद आप खुलते जाऍंगे ।

सब हवा कर कान देते हैं 'विजय' ।
हम हवा पर ऑंख रखते जाऍंगे ।

Rate this article:

Share this article:

Hubs Highlights International Sites Wikia messages
Entertainment
Gaming
Cartoons & Comics
Science Fiction
Hobbies
Sports
See all...
German
Spanish
Chinese
Japanese
More...
Wikia is hiring for several open positions
Send this article to a friend
"बर्फ के परवत पिघलते जाऍंगे / विजय वाते"
 
 
Hi!

I thought you'd like this page from Wikia!

http://hi.literature.wikia.com

Come check it out!
Send confirmation


.