बर्फ के परवत पिघलते जाऍंगे / विजय वाते
From Hindi Literature
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रचनाकार: विजय वाते | |
बर्फ के परवत पिघलते जाऍंगे ।
बात कीजे हल निकलते जाऍंगे ।
धूप के लिक्खे को जल्दी बॉंचिये ।
बारिशों में हर्फ घुलते जाऍंगे ।
अवसरों में मुश्किलें मत देखिये ।
हाथ से अवसर निकलते जाऍंगे ।
मुश्किलों में देखिये अवसर नये ।
रास्ते खुद आप खुलते जाऍंगे ।
सब हवा कर कान देते हैं 'विजय' ।
हम हवा पर ऑंख रखते जाऍंगे ।
