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बलि-पन्थी से / माखनलाल चतुर्वेदी

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कवि: माखनलाल चतुर्वेदी

~*~*~*~*~*~*~*~

मत व्यर्थ पुकारे शूल-शूल,

कह फूल-फूल, सह फूल-फूल।

हरि को ही-तल में बन्द किये,

केहरि से कह नख हूल-हूल।


कागों का सुन कर्त्तव्य-राग,

कोकिल-काकलि को भूल-भूल।

सुरपुर ठुकरा, आराध्य कहे,

तो चल रौरव के कूल-कूल।


भूखंड बिछा, आकाश ओढ़,

नयनोदक ले, मोदक प्रहार,

ब्रह्यांड हथेली पर उछाल,

अपने जीवन-धन को निहार।

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