FANDOM

१२,२६२ Pages

http://www.kavitakosh.orgKkmsgchng
































CHANDER

राग धनाश्री

बृंदाबन मोकों अति भावत ।
सुनहु सखा तुम सुबल, श्रीदामा,ब्रज तैं बन गौ चारन आवत ॥
कामधेनु सुरतरुसुख जितने, रमा सहित बैकुंठ भुलावत ।
इहिं बृंदाबन, इहिं जमुना-तट, ये सुरभी अति सुखद चरावत ॥
पुनि-पुनि कहत स्याम श्रीमुख सौं, तुम मेरैं मन अतिहिं सुहावत ।
सूरदास सुनि ग्वाल चकृत भए ,यह लीला हरि प्रगट दिखावत ॥


भावार्थ :-- (श्यामसुन्दर कहते हैं -) `सखा सुबल, श्रीदामा, तुम लोग सुनो! वृन्दावन मुझे बहुत अच्छा लगता है, इसी से व्रज से मैं यहाँ वन में गायें चराने आता हूँ । कामधेनु, कल्पवृक्ष आदि जितने वैकुण्ठ के सुख हैं, लक्ष्मी के साथ वैकुण्ठ के उन सब सुखों को मैं भूल जाता हूँ । इस वृन्दावन में, यहाँ यमुना किनारे इन गायों को चराना मुझे अत्यन्त सुखदायी लगता है ।' श्यामसुन्दर बार-बार अपने श्रीमुख से कहते हैं -`तुम लोग मेरे मन को बहुत अच्छे लगते हो । सूरदास जी कहते हैं कि गोपबालक यह सुनकर चकित हो गये, श्रीहरि अपनी लीला का यह रहस्य उन्हें प्रत्यक्ष दिखला (बतला) रहे हैं ।

Ad blocker interference detected!


Wikia is a free-to-use site that makes money from advertising. We have a modified experience for viewers using ad blockers

Wikia is not accessible if you’ve made further modifications. Remove the custom ad blocker rule(s) and the page will load as expected.

Also on FANDOM

Random Wiki