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बे-ऐतदालियों से सुबुक सब में हम हुए / गा़लिब

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CHANDER

बे-ऐतदालियों से सुबुक सब में हम हुए
जितने ज़ियादा हो गये उतने ही कम हुए

पिन्हाँ था दामे-सख़्त क़रीब आशियाँ के
उड़ने न पाये थे कि गिरफ़्तार हम हुए

हस्ती हमारी अपनी फ़ना पर दलील है
याँ तक मिटे के आप हम अपनी क़सम हुए

सख़्तीकशाने-इश्क़ की पूछे है क्या ख़बर
वो लोग रफ़्ता-रफ़्ता सरापा अलम हुए

तेरी वफ़ा से क्या हो तलाफ़ी कि दहर में
तेरे सिवा भी हम पे बहुत से सितम हुए

लिखते रहे जुनूँ की हिकायत-ए-ख़ूँचकाँ
हरचंद इस में हाथ हमारे क़लम हुए

अल्लाह रे! तेरी तुन्दी-ए-ख़ू जिस के बीम से
अज्ज़ा-ए-नाला दिल में मेरे रिज़्क़े-हम हुए

अहल-ए-हवस की फ़तह है तर्क-ए-नबर्द-ए-इश्क़
जो पाँव उठ गये वही उन के अलम हुए

नाल-ए-अदम में चंद हमारे सुपुर्द थे
जो वाँ न खिंच सके सो वो याँ आके दम हुए

छोड़ी 'असद' न हम ने गदाई में दिल्लगी
साइल हुए तो आशिक़-ए-अहल-ए-करम हुए

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