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मचल मत, दूर-दूर, ओ मानी / माखनलाल चतुर्वेदी

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कवि: माखनलाल चतुर्वेदी

~*~*~*~*~*~*~*~

मचल मत, दूर-दूर, ओ मानी !

उस सीमा-रेखा पर

जिसके ओर न छोर निशानी; मचल

घास-पात से बनी वहीं

मेरी कुटिया मस्तानी,

कुटिया का राजा ही बन

रहता कुटिया की रानी !

मचल मत, दूर-दूर, ओ मानी !


राज-मार्ग से परे, दूर, पर

पगडंडी को छू कर

अश्रु-देश के भूपति की है

बनी जहाँ रजधानी ।

मचल मत, दूर-दूर, ओ मानी !


आँखों में दिलवर आता है,

सैन-नसैनी चढ़कर,

पलक बाँध पुतली में

झूले देती कस्र्ण कहानी।

मचल मत, दूर-दूर, ओ मानी !


प्रीति-पिछौरी भीगा करती

पथ जोहा करती हूँ,

जहाँ गवन की सजनि

रमन के हाथों खड़ी बिकानी।

मचल मत, दूर-दूर, ओ मानी !


दो प्राणों में मचे न माधव

बलि की आँख मिचौनी,

जहाँ काल से कभी चुराई

जाती नहीं जवानी।

मचल मत, दूर-दूर, ओ मानी !


भोजन है उल्लास, जहाँ

आँखों का पानी, पानी!

पुतली परम बिछौना है

ओढ़नी पिया की बानी।

मचल मत, दूर-दूर, ओ मानी !


प्रान-दाँव की कुंज-गली

है, गो-गन बीचों बैठी,

एक अभागिन बनी श्याम धन

बनकर राधारानी।

मचल मत, दूर-दूर, ओ मानी !


सोते हैं सपने, ओ पंथी !

मत चल, मत चल, मत चल,

नजर लगे मत, मिट मत जाये

साँसों की नादानी।

मचल मत, दूर-दूर, ओ मानी !

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