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मथुरा प्रवेश तथा कंस बध / सूरदास

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CHANDER


बूझत हैं अक्रूरहिं स्याम ।
तरनि किरनि महलनि पर झाईं, इहै मधुपुरी नाम ॥
स्रवननि सुनत रहत हे जाकौं, सो दरसन भए नैन ।
कंचन कोट कँगूरनि की छबि , मानौ बैठे मैन ॥
उपवन बन्यौ चहूँधा पुर के, अतिहिं मोकौं भावत ।
सूर स्याम बलरामहिं पुनि पुनि, कर पल्लवनि दिखावत ॥1॥

मथुरा हरषित आजु भई ।
ज्यौं जुवती पति आवत सुनि कै, पुलकित अंग मई ॥
नवसत साजि सिंगार सुंदरी, आतुर पंथ निहारति ।
उड़ति धुजा तनु सुरति बिसारे , अंचल नहीं सँभारति ॥
उरज प्रगट महलनि पर कलसा, लसति पास बन सारी ।
ऊँचे अटनि छाज की सोभा, सीस उचाइ निहारी ॥
जालरंध्र इकटक मग जोवति, किंकिन कंचन दुर्ग ।
बेनी लसति कहाँ छबि ऐसी , महलनि चित्रे उर्ग ॥
बाजत नगर बाजने जहँ तहँ, और बजत घरियार ।
सूर स्याम बनिता ज्यौं चंचल, पग नूपुर झनकार ॥
मथुरा बनिता ज्यौं चंचल, पग नूपुर झनकार ॥2॥

मथुरा पुर मैं सोर पर्‌यौ ।
गरजत कंस बंस सब साजे, मुख कौ नीर हर्‌यौ ॥
पीरौ भयौ, फेफरी अधरनि, हिरदै अतिहिं डर्‌यौ ॥
नंद महर के सुत दोउ सुनि कै, नारिनि हर्ष सर्‌यौ ॥
कोउ महलनि पर कोउ छजनि पर, कुल लज्जा न कर्‌यौ ।
कोउ धाई पुर गलिन गलिन ह्वै, काम-धाम बिसर्‌यौ ॥
इंदु बदन नव जलद सुभग तनु, दोउ खग नयन कर्‌यौ ।
सूर स्याम देखत पुर-नारी, उर-उर प्रेम भर्‌यौ ॥3॥

ढौटा नंद कौ यह री ।
नाहि जानति बसत ब्रज मैं, प्रगट गोकुल री ॥
धर्‌यौ गिरिवर याम कर जिहिं, सोइ है यह री ।
दैत्य सब इनहीं सँहारे, आपु-भुज-बल री ॥
ब्रज-घरनि जो करत चोरी, खात माखन री ।
नंद-घरनी जाहिं बान्यौ, अजिर ऊखल री ॥
सुरभि-ठान लिये बन तैं आवत , सबहिं गुन इन री ।
सूर-प्रभु ये सबहिं लायक, कंस डरै जिन री ॥4॥

भए सखि नैन सनाथ हमारे ।
मदनगोपाल देखतहिं सजनी, सब दुख सोक बिसारे ॥
पठये हे सुफलक-सुत गोकुल, लैन सो इहाँ सिधारे !
मल्ल जुद्ध प्रति कंस कुटिल मति, छल करि इहाँ हँकारे ॥
मुष्टिक अरु चानूर सैल सम, सुनियत हैं अति भारे ।
कोमल कमल समान देखियत, ये जसुमति के बारे ॥
होवे जीति विधाता इनकी, करहु सहाइ सबारे ।
सूरदास चिर जियहु दुष्ट दलि, दोऊ नंद-दुलारे ॥5॥

धनुषसाला चले नँदलाला ।
सखा लिए संग प्रभु रंग नाना करत, देव नर कोउ न लखि सकत ख्याला ॥
नृपति के रजक सौं भेंट मग मैं भई, कह्यौ दै बसन हम पहिरि जाहीं ।
बसन ये नृपति के जासु प्रजा तुम, ये बचन कहत मन डरत नाहीं ॥
एक ही मुष्टिका प्रान ताके गए, लए सब बसन कछु सखनि दीन्हे ।
आइ दरजी गयौ बोलि ताकौं लयौ, सुभग अँग साजि उन विनय कीन्हे ॥
पुनि सुदामा कह्यौ गेह मम अति निकट, कृपा करि तहाँ हरि चरन धारे ।
धोइ पद-कमल पुनि हार आगैं धरे, भक्ति दै, तासु सब काज सारे ॥
लिए चंदन बहुरि आनि कुबिजा मिली, स्याम अँग लेप कीन्हौ बनाई ॥
रीझि तिहिं रूप दियौ, अंग सुधौ कियौ, बचन सुभ भाषि निज गृह पठाई ।
पुनि गए तहाँ जहँ धनुष, बोले सुभट हौंस, जनि मन करौ बन-बिहारी ।
सूर प्रभु छुवत धनु टूटि धरनी पर्‌यौ, सोर सुनि कंस भयौ भ्रमित भारी ॥6॥

सुनिहि महावत बात हमारी ।
बार-बार संकर्षन भाषत, लेत नाहिं ह्याँ तौं गज टारी ॥
मेरौ कह्यौ मानि रे मूरख, गज समेत तोहिं डारौं मारी ।
द्वारै खरे रहे हैं कबके, जानि रे गर्व करहि जिय भारी ॥
न्यारौ करि गयंद तू अजहूँ, जान देहि कै आपु सँभारी ।
सूरदास प्रभु दुष्ट निकंदन, धरनी भार उतारनकारी ॥7॥

तब रिस कियौ महावत भारि ।
जौ नहिं आज मारिहौं इनकौं, कंस डारिहै मारि ॥
आँकुस राखि कुंभ पर करष्यौ, हलधर उठे हँकारि ।
तब हरि पुँछ गह्यौ दच्छिन कर, कँबुक फेरि सिर वारि ।
पटक्यौ भूमि, फेरि नहिं मटक्यौ, लिन्हीं दंत उपारि ॥
दुहुँ कर दुरद दसन इक इक छबि, सो निरखतिं पुरनारि ।
सूरदास प्रभु सुर सुखदायक, मार्‌यौ नाग पछारि ॥8॥

एई सुत नँद अहीर के ।
मार्‌यौ रजक बसन सब लूटे, संग सखा बल वीर के ॥
काँधे धरि दोऊ जन आए , दंत कुबलयापीर के ।
पसुपति मंडल मध्य मनौ, मनि छीरधि नीरधि नीर के ॥
उड़ि आए तजि हंस मात मनु, मानसरोवर तीर के ।
सूरदास प्रभु ताप निबारन, हरन संत दुख पीर के ॥9॥

सुनौ हो बीर मुष्टिक चानूर सबै, हमहिं नृप पास नाहिं जान दैहौ ।
घेरि राखे हमैं, नहीं बूझै तुम्हैं, जगत में कहा उपहास लैहौ ॥
सबै यहै कैहै भली मत तुम पै है, नंद के कुँवर दोउ मल्ल मारे ।
यहै जस लेहुगे, जान नहिं देहुगे, खौजहीं परे अब तुम हमारे ॥
हम नहीं कहैं तुम मनहिं जौ यह बसी, कहत हौ कहा तौ करौ तैसी ।
सूर हम तन निरखि देखियै आपुकौं, बात तुम मनहिं यह बसी नैसी ॥10॥

गह्यौ कर स्याम भुज मल्ल अपने धाइ , झटकि लीन्हौ तुरत पटकि धरनी ।
भटकि अति सब्द भयौ, खटक नृप के हियैं, अटकि प्राननि पर्‌यौ चटक करनी ॥
लटकि निरखन लग्यौ, मटक सब भूलि गइ, हटक करि देउँ इहै लागी।
झटकि कुँडल निरखि, अटल ह्वै कै गयौ, गटकि सिल सौं रह्यौ मीच जागी ॥
मल्ल जे जे रहे सबै मारे तुरत, असुर जोधा सबै तेउ सँहारे ।
धाइ दूतन कह्यौ, कोउ न रह्यौ, सूर बलराम हरि सब पछारे ॥11॥

नवल नंदनंदन रंगभूमि राजैं ।
स्याम तन, पीत पट मनौ घन में तड़ित, मोर के पंख माथैं बिराजैं ॥
स्रवन कुंडल झलक मनौ चपला चमक, दृग अरुन कमल दल से बिसाला ।
भौंह सुंदर धनुष, बान सम सिर तिलक, केस कुंचित सोह भृंग माला ॥
हृदय बनमाल, नूपुर चरन लाल, चलत गज चाल, अति बुधि बिराजैं ।
हंस मानौ मानसर अरुन अंबुज सुभर, निरखि आनंद करि हरषि गाजैं ।
कुबलया मारि चानूर मुष्टिक पटकि, बीर दोउ कंध जग-दंत धारे ।
जाइ पहुँचे तहाँ कंस बैठ्यौ जहाँ, गए अवसान प्रभु के निहारे ॥
ढाल तरवारि आगैं धरी रहि गई , महल कौ पंथ खोजत न पावत ।
लात कैं लगत सिर तैं गयौ मुकुट गिरि, केस गहि लै चले हरि खसावत ।
चारि भुज धारि तेहिं चारु दरसन दियौ, चारि आयुध चहूँ हाथ लीन्हे ।
असुर तजि प्रान निरवान पद कौं गयौ, बिमल मति भई प्रभु रूप चीन्हे ॥
देखि यह पुहुप वर्षा करि सुरनि मिलि, सिद्द गंदर्व जय धुनि सुनाई ।
सूर प्रभु अगम महिमा न कछु कहि परति, सुरनि की गति तुरत असुर पाई ॥12॥

उग्रसेन कौं दियौ हरि राज ।
आनँद मगन सकल पुरवासी, चँवर डुलावत श्री ब्रजराज ॥
जहाँ तहाँ तैं जादव आए, कंस डरनि जे गए पराइ ।
मागध सूत करत सब अस्तुति, जै जै श्री जादवराइ ॥
जुग जुग बिरद यहै चलि आयौ, भए बलि के द्वारैं प्रतिहार ।
सूरदास प्रभु अज अबिनासी, भक्तनि हेत लेत अवतार ।13॥

तब बसुदेव हरषित गात ।
स्याम रामहिं कंठ लाए,हरषि देवै मात ।
अमर दिवि दुंदुभी दीन्ही, भयौ जैजैकार ।
दुष्ट दलि सुख दियौ संतनि, ये बसुदेव कुमार ॥
दुख गयौ बहि हर्ष पूरन, नगर के नर-नारि ।
भयौ पूरब फल सँपूरन, लह्यौ सुत दैत्यारि ॥
तुरत बिप्रनि बोलि पठये, धेनु कोटि मँगाइ ।
सूर के प्रभु ब्रह्मपूरन, पाइ हरषै राइ ॥14॥

बसुद्यौ कुल-ब्यौहार बिचारि ।
हरि हलधर कौं दियौ जनेऊ, करि षटरस ज्यौनारि ।
जाके स्वास-उसाँस लेत मैं, प्रगट भये श्रुति चार ।
तिन गायत्री सुनी गर्ग सौं, प्रभु गति अगम अपार ॥
विधि सौं धेनु दई बहु बिप्रनि,सहित सर्वऽलंकार ।
जदकुल भयौ परम कौतूहल जहँ तहँ गावतिं नार ॥
मातु देवकी परम मुदित ह्वै, देति निछावरि वारि ।
सूरदास की यहै आसिषा, चिर जयौ नंदकुमार ॥15॥

कुबरी पूरब तप करि राख्यौ ।
आए स्याम भवन ताहीं कै, नृपति महल सब राख्यौ ॥
प्रथमहिं धनुष तोरि आवत हे, बीच मिली यह धाइ ।
तिहिं अनुराग बस्य भए ताकैं, सो हित कह्यौ न जाइ ॥
देव-काज करि आवन कहि गए, दीन्हौ रूप अपार ।
कृपा दृष्टि चितवतहीं श्री भइ, निगम न पावत पार ॥
हम तैं दूरि दीन के पाछैं, ऐसे दीनदयाल ।
सूर सुरनि करि काज तुरतहीं, आवत तहाँ गोपाल ॥16॥

कियौ सुर-काज गृह चले ताकैं ।
पुरुष औ नारि कौ भेद भेदा नहीं, कुलिन अकुलीन अवतर्‌यौ काकैं ॥
दास दासी कौन, प्रभु निप्रभु कौन है, अखिल ब्रह्मांड इक रोम जाकैं ।
भाव साँचौ हृदय जहाँ, हरि तहाँ हैं, कृपा प्रभु की माथ भाग वाकैं ॥
दास दासी स्याम भजनहु तैं जिये, रमा सम भई सो कृष्नदासी ।
मिली वह सूर प्रभु प्रेम चंदन चरचि, कियौ जप कोटि, तप कोटि कासी ॥17॥

मथुरा दिन-दिन अधिक बिराजै ।
तेज प्रताप राइ कैसौ कैं, तीनि लोक पर गाजै ॥
पग पग तीरथ कोटिक राजैं, मधि विश्रांति बिराजै ।
करि अस्नान प्रात जमुना कौ, जनम मरन भय भाजै ॥
बिट्ठल बिपुल बिनोद बिहारन, ब्रज कौ बसिबौ छाजै ।
सूरदास सेवक उनहीं कौ, कृपा सु गिरधर राजै ॥18॥

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