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मेरे गांव में / पूर्णिमा वर्मन

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CHANDER


मेरे गाँव में कोई तो होगा

कम्प्यूटर पर बैठा मेरी राह देखता


मेरी पाती पढ़ने वाला

मेरी भाषा, मेरा दर्द समझने वाला

मेरी लिपि को मेरी तरहा रचने वाला

मेरी मिट्टी की ख़ुशबू में रचा-बसा-सा

मेरी सोच समझने वाला


या कोई मेरी ही तरहा

घर से बिछुड़ा

भारत की मिट्टी का पुतला

परदेशी-सा दिखने वाला

एकाकी कमरे में बैठा

खोज मोटरों में

उलझा-सा

टंकित करता होगा--

तरह-तरह से नाम पते

भाषा और रुचियाँ


ढूँढ रहा होगा

अपनों को मेरी तरहा

जीवन की आपाधापी में रमा हुआ भी

पूरा करने को कोई

बचपन का सपना ।

अपनों की आशा का सपना

देश और भाषा का सपना ।


मेरे गाँव में

बड़े-बड़े अपने सपने थे

दोस्त-गुरु परिचित कितने थे

बड़े घने बरगद के नीचे

बड़ी-बड़ी ऊँची बातें थीं

कहाँ गये सब ?


कोई नज़र नहीं आता है

यह सब कैसा सन्नाटा है ?

तोड़ो, यह सन्नाटा तोड़ो

नये सिरे से सब कुछ जोड़ो

दूर वहीं से हाथ हिलाओ

मेरी अनुगूँजों में आओ

आओ सफ़र लगे ना तन्हा

बोलो साथ-साथ तुम हो ना !

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