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मैं अपने से डरती हूँ सखि / माखनलाल चतुर्वेदी

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कवि: माखनलाल चतुर्वेदी

~*~*~*~*~*~*~*~

मैं अपने से डरती हूँ सखि !


पल पर पल चढ़ते जाते हैं,

पद-आहट बिन, रो! चुपचाप

बिना बुलाये आते हैं दिन,

मास, वरस ये अपने-आप;

लोग कहें चढ़ चली उमर में

पर मैं नित्य उतरती हूँ सखि !

मैं अपने से डरती हूँ सखि !


मैं बढ़ती हूँ? हाँ; हरि जानें

यह मेरा अपराध नहीं है,

उतर पड़ूँ यौवन के रथ से

ऐसी मेरी साध नहीं है;

लोग कहें आँखें भर आईं,

मैं नयनों से झरती हूँ सखि !

मैं अपने से डरती हूँ सखि !


किसके पंखों पर, भागी

जाती हैं मेरी नन्हीं साँसें ?

कौन छिपा जाता है मेरी

साँसों में अनगिनी उसाँसें ?

लोग कहें उन पर मरती है

मैं लख उन्हें उभरती हूँ सखि !

मैं अपने से डरती हूँ सखि  !


सूरज से बेदाग, चाँद से

रहे अछूती, मंगल-वेला,

खेला करे वही प्राणों में,

जो उस दिन प्राणों पर खेला,

लोग कहें उन आँखों डूबी,

मैं उन आँखों तरती हूँ सखि !

मैं अपने से डरती हूँ सखि !


जब से बने प्राण के बन्धन,

छूट गए गठ-बन्धन रानी,

लिखने के पहले बन बैठी,

मैं ही उनकी प्रथम कहानी,

लोग कहें आँखें बहती हैं;

उनके चरण भिगोने आयें,

जिस दिन शैल-शिखिरियाँ उनको

रजत मुकुट पहनाने आयें,

लोग कहें, मैं चढ़ न सकूँगी-

बोझीली; प्रण करती हूँ सखि !

मैं नर्मदा बनी उनके,

प्राणों पर नित्य लहरती हूँ सखि !

मैं अपने से डरती हूँ सखि !

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