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यह मन्दिर का दीप / महादेवी वर्मा

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यह मन्दिर का दीप इसे नीरव जलने दो!


रजत शंख-घड़ियाल, स्वर्ण वंशी, वीणा स्वर,

गये आरती बेला को शत-शत लय से भर;


जब था कल-कण्ठों का मेला

विहँसे उपल-तिमिर था खेला

अब मन्दिर में इष्ट अकेला;

इसे अजिर का शून्य गलाने को गलने दो!


चरणों से चिह्नित अलिन्द की भूमि सुनहली,

प्रणत शिरों को अंक लिये चन्दन की दहली,


झरे सुमन बिखरे अक्षत सित

धूप-अर्घ्य नैवेद्य अपरिमित

तम में सब होगे अन्तर्हित;

सबकी अर्चित कथा इसी लौ में पलने दो!


पल के मनके फेर पुजारी विश्व सो गया,

प्रतिध्वनि का इतिहास प्रस्तरों के बीच सो गया;


साँसो की समाधि का जीवन

मसि-सागर का पंथ गया वन;

रुका मुखर कण-कण का स्पन्दन।

इस ज्वाला में प्राण-रूप फिर से ढलने दो!


झंझा है दिग्भ्रान्त रात की मूर्च्छा गहरी,

आज पुजारी बने, ज्योति का यह लघु प्रहरी;


जब तक लौटे दिन की हलचल,

तब कर यह जागेगा प्रतिपल

रेखाओं में भर आभा जल;

दूत साँझ का इसे प्रभाती तक चलने दो!

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