FANDOM

१२,२६२ Pages

लेखक: सुमित्रानंदन पंत

~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~

विदा हो गई साँझ, विनत मुख पर झीना आँचल धर
मेरे एकाकी मन में मौन मधुर स्मृतियाँ भर!
वह केसरी दुकुल अभी भी फहरा रहा क्षितिज पर,
नव असाढ के मेघों से घिर रहा बराबर अम्बर!
मैं बरामदे में लेटा शैय्या पर, पीडित अवयव,
मन का साथी बना बादलों का विषाद है नीरव!
सक्रिय यह सकरुण विषाद, -मेघों से उमड घुमड कर
भावी के बहुस्वप्न, भाव बहु व्यथित कर रहे अंतर!
मुखर विरह दादुर पुकारता उत्कंठित भेकी को,
वर्ह भार से मोर लुभाता मेघ-मुग्ध केकी को,
आलोकित हो उठता सुख से मेघों का नभ चंचल,
अंतरतम में एक मधुर स्मृति जग जग उठती प्रतिपल।
कम्पित करता वक्ष धरा का घन गंभीर गर्जन स्वर,
भू पर आ ही गया उतर शत धाराओं में अम्बर!
भीनी भाप सहज ही साँसों में घुल मिल कर
एक और भी मधुर गंध से हृदय दे रही है भर!
नव असाढ की संध्या में, मेघों के तम में कोमल,
पीडित एकाकी शैय्या पर, शत भावों से विह्व्ल,
एक मधुरतम स्मृति पल भर विद्युत सी जल कर उज्जवल
याद दिलाती मुझे, हृदय में रहती जो तुम निश्चल!

Ad blocker interference detected!


Wikia is a free-to-use site that makes money from advertising. We have a modified experience for viewers using ad blockers

Wikia is not accessible if you’ve made further modifications. Remove the custom ad blocker rule(s) and the page will load as expected.

Also on FANDOM

Random Wiki