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ये वृक्षों में उगे परिन्दे / माखनलाल चतुर्वेदी

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कवि: माखनलाल चतुर्वेदी

~*~*~*~*~*~*~*~


ये वृक्षों में उगे परिन्दे

पंखुड़ि-पंखुड़ि पंख लिये

अग जग में अपनी सुगन्धित का

दूर-पास विस्तार किये।


झाँक रहे हैं नभ में किसको

फिर अनगिनती पाँखों से

जो न झाँक पाया संसृति-पथ

कोटि-कोटि निज आँखों से।


श्याम धरा, हरि पीली डाली

हरी मूठ कस डाली

कली-कली बेचैन हो गई

झाँक उठी क्या लाली!


आकर्षण को छोड़ उठे ये

नभ के हरे प्रवासी

सूर्य-किरण सहलाने दौड़ी

हवा हो गई दासी।


बाँध दिये ये मुकुट कली मिस

कहा-धन्य हो यात्री!

धन्य डाल नत गात्री।

पर होनी सुनती थी चुप-चुप

विधि -विधान का लेखा!

उसका ही था फूल

हरी थी, उसी भूमि की रेखा।


धूल-धूल हो गया फूल

गिर गये इरादे भू पर

युद्ध समाप्त, प्रकृति के ये

गिर आये प्यादे भू पर।


हो कल्याण गगन पर-

मन पर हो, मधुवाही गन्ध

हरी-हरी ऊँचे उठने की

बढ़ती रहे सुगन्ध!


पर ज़मीन पर पैर रहेंगे

प्राप्ति रहेगी भू पर

ऊपर होगी कीर्ति-कलापिनि

मूर्त्ति रहेगी भू पर।।

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