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यौवन का पागलपन / माखनलाल चतुर्वेदी

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कवि: माखनलाल चतुर्वेदी

~*~*~*~*~*~*~*~

हम कहते हैं बुरा न मानो,

यौवन मधुर सुनहली छाया।


सपना है, जादू है, छल है ऐसा

पानी पर बनती-मिटती रेखा-सा,

मिट-मिटकर दुनिया देखे रोज़ तमाशा।

यह गुदगुदी, यही बीमारी,

मन हुलसावे, छीजे काया।


हम कहते हैं बुरा न मानो,

यौवन मधुर सुनहली छाया।


वह आया आँखों में, दिल में, छुपकर,

वह आया सपने में, मन में, उठकर,

वह आया साँसों में से स्र्क-स्र्ककर।


हो न पुरानी, नई उठे फिर

कैसी कठिन मोहिनी माया!


हम कहते हैं बुरा न मानो,

यौवन मधुर सुनहली छाया।

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