FANDOM

१२,२६२ Pages

http://www.kavitakosh.orgKkmsgchng
































CHANDER

मुखपृष्ठ: पद्मावत / मलिक मोहम्मद जायसी

कै बसंत पदमावति गई । राजहि तब बसंत सुधि भई ॥
जो जागा न बसंत न बारी । ना वह खेल, न खेलनहारी ॥
ना वह ओहि कर रूप सुहाई । गै हेराइ, पुनि दिस्टि न आई ॥
फूल झरे, सूखी फुलवारी । दीठि परी उकठी सब बारी ॥
केइ यह बसत बसंत उजारा ?। गा सो चाँद, अथवा लेइ तारा॥
अब तेहि बिनु जग भा अँधकूपा । वह सुख छाँह, जरौं दुख-धूपा ॥
बिरह-दवा को जरत सिरावा ?। को पीतम सौं करै मेरावा ?॥

हिये देख तब चंदन खेवरा, मिलि कै लिखा बिछोव ।
हाथ मींजि सिर धुनि कै रोवै जो निचींत अस सोव ॥1॥

जस बिछोह जल मीन दुहेला । जल हुँत काढि अगिनि महँ मेला ॥
चंदन-आँक दाग हिय परे । बुझहिं न ते आखर परजरे ॥
जनु सर-आगि होइ हिय लागे । सब तन दागि सिंघ बन दागे ॥
जरहिं मिरिग बन-खँड तेहि ज्वाला । औ ते जरहिं बैठ तेहि छाला ॥
कित ते आँक लिखे जौं सोवा । मकु आँकन्ह तेइ करत बिछौवा ॥
जैस दुसंतहि साकुंतला । मधवानलहि काम-कंदला ॥
भा बिछोह जस नलहि दमावति । मैना मूँदि छपी पदमावति ॥

आइ बसंत जो छिप रहा होइ फूलन्ह के भेस ।
केहि बिधि पावौं भौंर होइ, कौन गुरू-उपदेस ॥2॥

रोवै रतन-माल जनु चूरा । जहँ होइ ठाढ, होइ तहँ कूरा ॥
कहाँ बसंत औ कोकिल-बैना । कहाँ कुसुम अति बेधा नैना ॥
कहाँ सो मूरति परी जो डीठी । काढि लिहेसि जिउ हिये पईठी ॥
कहाँ सो देस दरस जेहि लाहा ?। जौं सुबसंत करीलहि काहा ?॥
पात-बिछोह रूख जो फूला । सो महुआ रोवै अस भुला ॥
टपकैं महुअ आँसु तस परहीं । होइ महुआ बसमत ज्यों झरहीं ॥
मोर बसंत सो पदमिनि बरी । जेहि बिनु भएउ बसंत उजारी ॥

पावा नवल बसंत पुनि बहु बहु आरति बहु चोप ।
ऐस न जाना अंत ही पात झरहिं, होइ कोप ॥3॥

अरे मलिछ बिसवासी देवा । कित मैं आइ कीन्ह तोरि सेवा ॥
आपनि नाव चढै जो देई । सो तौ पार उतारे खेई ॥
सुफल लागि पग टेकेउँ तोरा । सुआ क सेंबर तू भा मोरा ॥
पाहन चढि जो चहै भा पारा । सो ऐसे बूडै मझ धारा ॥
पाहन सेवा कहाँ पसीजा ?। जनम न ओद होइ जो भीजा ॥
बाउर सोइ जो पाहन पूजा । सकत को भार लेइ सिर दूजा ?॥
काहे न जिय सोइ निरासा । मुए जियत मन जाकरि आसा ॥

सिंघ तरेंदा जेइ गहा पार भए तेहि साथ ।
ते पै बूडे बाउरे भेंड-पूंछि जिन्ह हाथ ॥4॥

देव कहा सुनु, बउरे राजा । देवहि अगुमन मारा गाजा ॥
जौं पहिलेहि अपने सिर परई । सो का काहुक धरहरि करई ॥
पदमावति राजा कै बारी । आइ सखिन्ह सह बदन उघारी ॥
जैस चाँद गोहने सब तारा । परेउँ भुलाइ देखि उजियारा ॥
चमकहिं दसन बीजु कै नाई । नैन-चक्र जमकात भवाँई ॥
हौं तेहि दीप पतंग होइ परा । जिउ जम काढि सरग लेइ धरा ॥
बहुरि न जानौं दहुँ का भई । दहुँ कविलास कि कहुँ अपसई ॥

अब हौं मरौं निसाँसी, हिये न आवै साँस ।
रोगिया की को चालै, वेदहि जहाँ उपास ?॥5॥

आनहि दोस देहुँ का काहू । संगी कया, मया नहिं ताहू ॥
हता पियारा मीत बिछोई । साथ न लाग आपु गै सोई ॥
का मैं कीन्ह जो काया पोषी । दूषन मोहिं, आप निरदोषी ॥
फागु बसंत खेलि गई गोरी । मोहि तन लाइ बिरह कै होरी ॥
अब कस कहाँ छार सिर मेलौं ?। छार जो होहुँ फाग तब खेलौं ॥
कित तप कीन्ह छाँडि कै राजू । गएउ अहार न भा सिध काजू ॥
पाएउ नहिं होइ जोगी जती । अब सर चढौं जरौं जस सती ॥

आइ जो पीतम फिरि गा, मिला न आइ बसंत ।
अब तन होरी घालि कै, जारि करौं भसमंत ॥6॥

ककनू पंखि जैस सर साजा । तस सर साजि जरा चह राजा ॥
सकल देवता आइ तुलाने । दहुँ का होइ देव असथाने ॥
बिरह -अगिनि बज्रागि असूझा । जरै सूर न बुझाए बूझा ॥
तेहि के जरत जो उठै बजागी । तिनउँ लोक जरैं तेहि लागी ॥
अबहि कि घरी सो चिनगी छूटै । जरहिं पहार पहन सब फूटै ॥
देवता सबै भसम होइ जाहीं । छार समेटे पाउब नाहीं ॥
धरती सरग होइ सब ताता । है कोई एहि राख बिधाता ॥

मुहमद चिंनगी पेम कै ,सुनि महि गगन डेराइ ।
धनि बिरही औ धनि हिया, तहँ अस अगिनि समाइ ॥

हनुवँत बीर लंक जेइ जारी । परवत उहै अहा रखवारी ॥
बैठि तहाँ होइ लंका ताका । छठएँ मास देइ उठि हाँका ॥
तेहि कै आगि उहौ पुनि जरा ।लंका छाडि पलंका परा ॥
जाइ तहा वै कहा संदेसू । पारबती औ जहाँ महेसू ॥
जोगी आहि बियोगी कोई । तुम्हरे मँडप आगि तेइ बोई ॥
जरा लँगूर सु राता उहाँ । निकसि जो भागि भएउँ करमुहाँ ॥
तेहि बज्रागि जरै हौं लागा । बजरअंग जरतहि उठि भागा ॥

रावन लंका हौं दही, वह हौं दाहै आव ।
गए पहार सब औटि कै, को राखै गहि पाव ?॥8॥


(1) उकठी = सूख कर ऐंठी हुई । अथवा = अस्त हुआ । खेवरा = खौरा हुआ, चित्रित किया या लगाया हुआ ।

(2) हुँत =से । परजरे = जलते रहे । सर-आगि = अग्निबाण । सब...दागे = मानों उन्हीं अग्निबाणों से झुलसकर सिंह के शरीर में दाग बन गए हैं और बन में आग लगा करती है । कितते आँक...सोवा = जब सोया था तब वे अंक क्यों लिखे गए; दूसरे पक्ष में जब जीव अज्ञान-दशा में गर्भ में रहता है तब भाग्य का लेख क्यों लिखा जाता है । दमावति = दमयंती ।

(3) कहाँ सों देस....लाहा ? = बसंत के दर्शन से लाभ उठानेवाला अच्छा देश चाहिए, सो कहाँ है ? करील के वन में वसंत के जाने ही से क्या ? आरति = दुःख । चोप =चाह ।

(4) ओद = गीला, आर्द्र । तरेंदा = तैरनेवाला काठ बेडा ।

(5) गाजा = गाज, बज्र । धरहरि = धर-पकड, बचाव । गोहने = साथ या सेवा में । अपसई =गायब हो गई । निसाँसी = बेदम । को चालै = कौन चलावै ?

(6) हता = था, आया था । सर = चिता ।

(7) ककनू = एक पक्षी जिसके संबंध में प्रसिद्ध है कि आयु पूरी होने पर वह घोंसले में बैठकर गाने लगता है जिससे आग लग जाती है और वह जल जाता है । पहन = पाषाण,पत्थर। पलंका = पलँग, चारपाई अथवा लंका के भी आगे`पलंका' नामक कल्पित द्वीप ।

Ad blocker interference detected!


Wikia is a free-to-use site that makes money from advertising. We have a modified experience for viewers using ad blockers

Wikia is not accessible if you’ve made further modifications. Remove the custom ad blocker rule(s) and the page will load as expected.

Also on FANDOM

Random Wiki