Fandom

Hindi Literature

राजा-सुआ-संवाद-खंड / मलिक मोहम्मद जायसी

१२,२६२pages on
this wiki
Add New Page
Talk0 Share
http://www.kavitakosh.orgKkmsgchng.png
































CHANDER

मुखपृष्ठ: पद्मावत / मलिक मोहम्मद जायसी


राजै कहा सत्य कहु सूआ । बिनु सत जन सेंवर कर भूआ ॥
होइ मुख रात सत्य के बाता । जहाँ सत्य तहँ धरम सँघाता ॥
बाँधी सिहिटि अहै सत केरी । लछिमी अहै सत्य कै चेरी ॥
सत्य जहाँ साहस सिधि पावा । औ सतबादी पुरुष कहावा ॥
सत कहँ सती सँवारे सरा । आगि लाइ चहुँ दिसि सत जरा ॥
दुइ जग तरा सत्य जेइ राखा । और पियार दइहि सत भाखा ॥
सो सत छाँडि जो धरम बिनासा । भा मतिहीन धरम करि नासा ॥

तुम्ह सयान औ पंडित, असत न भाखौं काउ ।
सत्य कहहु तुम मोसौं, दुहुँ काकर अनियाउ ॥1॥

सत्य कहत राजा जिउ जाऊ । पै मुख असत न भाखौं काऊ ॥
हौं सत लेइ निसरेउँ एहि बूते । सिंघलदीप राजघर हूँते ॥
पदमावति राजा कै बारी । पदुम-गंध ससि बिधि औतारी ॥
ससि मुख, अंग मलयगिरि रानी । कनक सुगंध दुआदस बानी ॥
अहैं जो पदमिनि सिंघल माहाँ । सुगँध रूप सब तिन्हकै छाहाँ ॥
हीरामन हौं तेहिक परेवा । कंठा फूट करत तेहि सेवा ॥
औ पाएउँ मानुष कै भाषा । नाहिं त पंखि मूठि भर पाँखा ॥

जौ लहि जिऔं रात दिन सँवरौं ओहि कर नावँ ।
मुख राता, तत हरियर दुहूँ जगत लेइ जावँ ॥2॥

हीरामन जो कवँल बखाना । सुनि राजा होइ भँवर भुलाना ॥
आगे आव, पंखि उजियारा । कहँ सो दीप पतँग कै मारा ॥
अहा जो कनक सुबासित ठाऊँ । कस न होइ हीरामन नाऊँ ॥
को राजा, कस दीप उतंगू । जेहि रे सुनत मन भएउ पतंगू ॥
सुनि समिद्र भा चख किलकिला । कवँलहि चहौं भँवर होइ मिला ॥
कहु सुगंध धनि कस निरमली । भा अलि-संग, कि अबहीं कली ?॥
औ कहु तहँ जहँ पदमिनी लोनी । घर-घर सब के होइ जो होनी ॥

सबै बखान तहाँ कर कहत सो मोसौं आव ।
चहौं दीप वह देखा,सुनत उठा अस चाव ॥3॥

का राजा हौं बरनौं तासू । सिंघलदीप आहि कैलासू ॥
जो गा तहाँ भुलाना सोई । गा जुग बीति न बहुरा कोई ॥
घर घर पदमिनि छतिसौ जाती ।सदा बसंत दिवस औ राती ॥
जेहि जेहि बरन फूल फुलवारी । तेहि तेहि बरन सुगंध सो नारी ॥
गंध्रबसेन तहाँ बड राजा । अछरिन्ह महँ इंद्रासन साजा ॥
सो पदमावति तेहि कर बारी । जो सब दीप माँह उजियारी ॥
चहूँ खंड के बर जो ओनाही । गरबहि राजा बोलै नाहीं ॥
उअत खंड के बर जो ओनाही । गरबहि राजा बोलै नाहीं ॥

उअत सूर जस देखिय चाँद छपै तेहि धूप ।
ऐसे सबे जाहिं छपि पदमावति के रूप ॥4॥

सुनि रवि-नावँ रतन भा राता । पंडित फेरि उहै कहु बाता ॥
तें सुरंग मूरत वह कही । चित महँ लागि चित्र होइ रही ॥
जनु होइ सुरुज आइ मन बसी । सब घट पूरि हिये परगसी ॥
अब हौं सुरुज, चाँद वह छाया । जल बिनुमीन, रकत बिनु काया ॥
किरिन-करा भा प्रेम -अँकूरू । जौ ससि सरग, मिलौं होइ सूरू ॥
सहसौ करा रूप मन भूला । जहँ जहँ दीठ कवँल जनु फूला ॥
तहाँ भवँर जिउ कँवला गंधी । भइ ससि राहु केरि रिनि बंधी ॥

तीनि लोक चौदह खंड सबै परै मोहिं सूझि ।
पेम छँडि नहिं लोन किछु , जो देखा मन बूझि ॥5॥

पेम सुनत मन भूल न राजा । कठिन पेम, सिर देइ तौ छाजा ॥
पेम-फाँद जो परा न छूटा । जीउ दीन्ह पै फाँद न टूटा ॥
गिरगिट छंद धरै दुख तेता । खन खन पीत, रात खन सेता ॥
जान पुछार जो भा बनबासी । रोंव रोंव परे फँद नगवासी ॥
पाँखन्ह फिरि फिरि परा सो फाँदू । उडि न सकै, अरुझा भा बाँदू ॥
`मुयों मुयों' अहनिसि चिल्लाई । ओही रोस नागन्ह धै खाई ॥
पंडुक, सुआ, कंक वह चीन्हा । जेहिं गिउ परा चाहि जिउ दीन्हा ॥

तितिर-गिउ जो फाँद है, नित्ति पुकारै दोख ।
सो कित हँकार फाँद गिउ (मेलै) कित मारे होइ मोख ॥6॥

राजै लीन्ह ऊबि कै साँसा । ऐस बोल जिनि बोलु निरासा ॥
भलेहि पेम है कठिन दुहेला । दुइ जग तरा पेम जेइ खेला ॥
दुख भीतर जो पेम-मधु राखा । जग नहिं मरन सहै जो चाखा ॥
जो नहिं सीस पेम-पथ लावा । सो प्रिथिमी महँ काहे क आवा? ॥
अब मैं पंथ पेम सिर मेला । पाँव न ठेलु, राखु कै चेला ॥
पेम -बार सो कहै जो देखा । जो न देख का जान विसेखा ?॥
तौ लगि दुख पीतम नहिं भेंटा । मिलै, तौ जाइ जनम-दुख मेटा ॥

जस अनूप, तू बरनेसि, नखसिख बरनु सिंगार ।
है मोहिं आस मिलै कै, जौ मेरवै करतार ॥7॥


(1) भूआ = सेमल की रूई । मुख रात होई = सुर्खरू होता है । सरा = चिता ।

(2) घर हूँते = घर से (प्रा0 पंचमी विभक्ति `हितो') दुवादस बानी = बारह बानी, चोखा (द्वादश वर्ण अर्थात् द्वादश आदित्य के समान ) कंठा फूट = गले में कंठे की लकीर प्रकट हुई । सयाना हुआ ।

(3) पतंग कै मारा = जिसने पतंग बनाकर मारा । उतंगू = ऊँचा । किलकिला = जल के ऊपर मछली के लिये मँडराने वाला एक जलपक्षी । होनी =बात, ब्यवहार ।

(4) अछरी - अप्सरा । ओनाहीं = झुकते हैं ।

(5) करा = कला । लोन = सुंदर ।

(6) छंद = रूप रचना । पुछार = मयूर, मोर । नगवासी = नागों का फंदा अर्थात् नागपाश ।

(6) धै =धरकर । चीन्हा = चिह्न, लकीर, रेखा ।

(7) ऊबि कै साँस लीन्ह = लंबी साँस ली । दुहेला = कठिन खेल । पाँव न ठेलु = पैर से न ठुकरा, तिरस्कार न कर । बिसेखा = मर्म

Ad blocker interference detected!


Wikia is a free-to-use site that makes money from advertising. We have a modified experience for viewers using ad blockers

Wikia is not accessible if you’ve made further modifications. Remove the custom ad blocker rule(s) and the page will load as expected.

Also on Fandom

Random Wiki