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रात की मुट्ठी / जगदीश व्योम

< रात की मुट्ठी

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CHANDER

वक्त का आखेटक

घूम रहा है

शर संधान किए

लगाए है टकटकी

कि हम

करें तनिक सा प्रमाद

और, वह

दबोच ले हमें

तहस नहस कर दे

हमारे मिथ्याभिमान को

पर

आएगा सतत नैराश्य ही

उसके हिस्से में

क्यों कि

हमने पहचान ली है

उसकी पगध्वनि

दूर हो गया है

हमसे

हमारा तंद्रिल व्यामोह

हम ने पढ़ लिए हैं

समय के पंखों पर उभरे

पुलकित अक्षर

जिसमें लिखा है कि-

आओ!

हम सब मिल कर

खोलें !

रात की मुठ्ठी को

जिसमें कैद है

समूचा सूरज !!

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