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रुक्मिणी परिणय / सूरदास

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CHANDER

हरि हरि हरि सुमिरन करौ । हरि चरनारबिंद उर धरौ ॥
हरि सुमिरन जब रुकमिनि कर्यौ । हरि करि कृपा ताहि तब बर्यौ ॥
कहौं सो कथा सुनौ चित लाइ । कहै सुनै सो रहै सुख पाइ ॥
कुंडिनपुर को भीषम राइ । बिश्नु भक्ति कौ तिहिं चित्त चाइ ॥
रुक्म आदि ताके सुत पाँच, रुकमिनि पुत्री हरि रँग राँच ॥
नृपति रुक्म सों कह्यौ बनाइ । कुँवरि जोग बर श्री जदुराइ ।
।रुक्म रिसाइ पिता सौं कह्यौ । जदुपति ब्रज जो चिरत मह्यौ ॥
रुक्मनि कौं सिसुपालहि दीजै । करि विवाह जग मैं जस लीजै ॥
यह सुनि नृप नारी सौं कह्यौ । सुनि ताकौं अंतरगत दह्यौ ॥
रुक्म चँदेरी बिप्र पठायौ । ब्याह काज सिसुपाल बुलायौ ॥
सो बारात जोरि तहँ आयौ । श्री रुकमिनि के मन नहिं भायौ
कह्यौ मेरे पति श्री भगवान । उनहिं बरौं कै तजौ परान ॥
यह निहचै करि पत्री लिखी । बोल्यौ बिप्र सहज इक सखी ॥
पाती दै कह्यौ बचन बाम । सूर जपति निसि दिन तुव नाम ॥
भीषण सुता रुकमिनी बाम । सूर जपति निसि दिन तुव नाम ॥1॥

द्विज पाती दै कहियौ स्यामहिं ।
कुंडिनपुर की कुँवरि रुकमनि, जपति तुम्हारे नामहिं ॥
पालागौं तुम जाहु द्वारिका, नंद-नंदनके धामहिं ।
कंचन, चीर-पटंबर देहौं, कर कंकन जु इनामहिं ॥
यह सिसुपाल असुचि अज्ञानी, हरत पराई बामहिं ।
सूर स्याम प्रभु तुम्हरौ भरोसौ, लाज करौ किन नामहिं ॥2॥

द्विज कहियौ जदुपति सौं बात बेद बिरुद्ध होत
कुंडिनपुर, हंस के अंस काग नियरात ॥
जनि हमरे अपराध बिचारहु, कन्या लिख्यौ मेटि गुरु तात ।
तन आत्मा समरप्यौ तुमकौं, उपजि परी तातैं यह बात ॥
कृपा करहु उठि बेगि चढ़हु रथ, लगे समै आवहु परभात ।
कृष्न सिंह बलि धरी तुम्हारी, लैबै कौं जंबुक अकुलात ॥
तातैं मैं द्विज बेगि पठायौ, नेम धरम मरजादा जात ।
सूरदास सिसुपाल पानि गहै, पावक रचौं करौं आघात ॥3॥

सुनत हरि रुकमिनि कौ संदेस ।
चढ़ि रथ चलै बिप्र कौं सँग लै, कियौ न गेह प्रवेस ॥
बारंबार बिप्र कों पूछत, कुँवरि बचन सो सुनावत ।
दीनबंधु करुना निधान सुनि, नैन नीर भरि आवत ॥
कह्यौ हलधर सौं आवहु दल लै, मैं पहुँचत हौं धाइ ।
सूरज प्रभु कुंडिनपुर आए, बिप्र सो जाइ सुनाइ ॥4॥

रुक्मिनि देवी-मंदिर आई ।
धूप दीप पूजा-सामग्री, अली संग सब ल्याई ॥
रखवारी कौं बहुत महाभट, दीन्हे रुकम पठाई ।
ते सब सावधान भए चहुँ दिसि, पंछी तहाँ न जाई ॥
कुँवरि पूजि गौरी बिनती करी, वर देउ जादवराई ।
मैं पूजा कीन्ही इहिं कारन, गौरी सुनि मुसकाई ॥
पाइ प्रसाद अंबिका-मंदिर, रुकमिनि बाहर आई ।
सुभट देखि सुंदरता मोहे, धरनि गिरे मुरझाई ॥
इहिं अंतर जादौपति आए, रुकमिनि रथ बैठाई ।
सूरज प्रभु पहुँचे दल अपनैं, तब सुभटनि सुधि पाई ॥5॥

आवहु री मिलि मंगल गावहु ।
हरि रुकमिनी लिए आवत हैं, यह आनँद जदुकुलहिं सुनावहु ॥
बाँधहु बंदनवार मनोहर, कनक कलस भरि नीर धरावहु ।
दधि अच्छत फल फूल परम रुचि, आँगन चंदन चौक पुरवाहु ॥
कदली जूथ अनूप किसल दल, सुरँग सुमन लै मंडल छावहु ।
हरद दूब केसर मग छिरकहु; भेरी मृदंग निसान बजावहु ॥
जरासंध सिसुपाल नृपति तैं , जीते हैं उठि अरघ चढ़ावहु ।
बल समेत तन कुसल सूर प्रभु, आए हैं आरती बनावहु ॥6॥

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