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Hindi Literature

रूदन / मोहन कुमार डहेरिया

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CHANDER


जी हाँ
अब मैं रोना चाहता हूँ

कहा जब मैंने
बंद हो गया बजता संगीत
घेर लिया सबने उन्मादियों की तरह
अड़ा रहा लेकिन मैं
रोने के हो सकते हैं जितने भी तरीके
हाँ, सभी से रोना चाहता हूँ

रोती है माथे का सिन्दूर मिटा दिये जाने पर
सीने पर दोहत्थड़ मारकर जैसे कोई स्त्री
रोता है झुंड से छूट जाने पर
घने जंगल में जैसे कोई मेमना
रोता अत्यंत सभ्य आदमी
काटता दाँतों से अपनी आत्मा

रोने के लिए नहीं होती कोई निश्चित समयावधि
किसी के लिए काफी है पलक झपकने का समय
नाकाफी किसी के लिए पूरी उम्र
जैसे कि माताएँ
जैसे कि बहनें
तिनके की आड़ में भी रो लेता है कोई
छोटी पड़ जाती किसी के लिए चीन की दीवार भी
निकल जाते हैं अक्सर
पृथ्वी के बाहर उनके दुख के छींटे

अनगिनत रोने की शैलियाँ और शिल्प
संभव नहीं एक-एक का जिक्र
फिलहाल तो मैं रोना चाहता हूँ

रोती है जैसे चिलचिलाती धूप में
मरुस्थल की रेत
रोता है ज्ञान के शिखर पर पहुँचकर
जैसे कोई प्रकांड विद्वान
रोता है जैसे मूँछों ही मूँछों में
एक रौबदार आदमी

हालाँकि रोने के लिए नहीं है अभी कोई मार्मिक दृश्य
बिल्कुल भी नहीं है मेरे पास
बहुत ठोस और उपयुक्त कारण
फिर भी बिना आँसुओं के,
बिना कारणों के रोना चाहता हूँ मैं
वैसे काफी नहीं क्या रुदन के लिए यह
कि मात्र अँगुलियों पर गिने जा सकते हैं दुनिया में अब सफेद शेर
कि मृत्यु नहीं है एक यातना का नाम
तब्दील हो चुकी वह कुछ लोगों के लिए अलौकिक आनंद में
मूर्खता का पर्याय बनती जा रही हैं बचपन की शरारतें
रहे नहीं सुरक्षित अब घर
ज्यादा बासी नहीं हुई है यह खबर
कि चींथ डाला दिल्ली की पाश कालोनी के एक बँगले में
जर्मनी खूँखार कुत्तों ने एक बच्चे का बदन

शामिल है जिस तरह हमारी दिनचर्या में
सुबह का नाश्ता,
शाम की सैर
रहे थोड़ा-थोड़ा रुदन भी
अब यह आटे में नमक की तरह हो
या हो किताब में एक पूरा ही पृष्ठ
तय करें यह तो विद्वज्जन
मैं तो बस इतना जानता हूँ
अभी भी हैं कुछ ऐसी यात्राएँ
तय की जा सकती हैं जो सिर्फ रोते-रोते
कुछ ताले जंग लगे बेहद पुराने
मार्मिक विलाप जिनकी बेहतर चाबी
कुछ आनंद हैं ऐसे,
अटाटूट आँसू ही जिनका वास्तविक लुत्फ
रोते-रोते ही पास आ सकेंगे हम
रोते-रोते ही आएगी हममें जुदा होने की ताकत
ऐसे खिलखिलाते समय में,
करोड़ों रुपये बटोर रही है जब वर्ष की सबसे घटिया धुन
एक जगह इकट्ठा होने के बावजूद
छू नहीं पा रही मर्म को कोई भी कला
पसीना-पसीना हो चुके हैं हँसाने की कोशिश में
सारे विदुषक

मैं समझता हूँ
बहुत जरूरी है रुदन,
खोल दे जो हमारे शरीर के सारे अकड़े हुए अंग
एक ही झटके में नट-बोल्ट की तरह

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