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लो, ख़ुश रहो उठाकर तुम, / ओसिप मंदेलश्ताम

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साँचा:KKAnooditRachna


लो, ख़ुश रहो उठाकर तुम, इस हथेली से मेरी

सूरज के एक टुकड़े-सी, मीठे मधु की ये ढेरी

हम से कही यह बात पेर्सेफ़ोना की मधुमक्खी ने


कोई खोल नहीं सकता पहले से खुली नाव को

कोई देख नहीं सकता समूर में लिपटी छाँव को

भय-घिरे जीवन को कोई और डरा नहीं सकता


हमारे लिए तो अब चुम्बन ही बचे हैं शेष

छोटी-छोटी झबरी-सी मधुमक्खियों के अवशेष

अपने उस छत्ते से उड़कर मर रही हैं जो


रात के झीने झुरमुट में सरसरा रही हैं वे

ताइगा के घने वन में घर बना रही हैं वे

समय, पराग और गंध ही भोजन है उनका


लो, ज़रा मुझ से भैया, उपहार यह जंगली ले लो

सूखी-मृत मक्खियों की, अदृश्य ये मंगली ले लो

मधु बदल गया मेरा अब सूरज के टुकड़े में


पेर्सेफ़ोना= यूनानी मिथक परम्परा में मृत्युलोक की देवी;

ताइगा=शंकु-वृक्षों के सघन साइबेरियाई वन-क्षेत्र;

मंगली=माला


(रचनाकाल : नवम्बर 1920)

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