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रचनाकार: तारा सिंह

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जीवन की विरक्ति क बोझ ढोते - ढोते जब जिंदगी थक जाती है
तब यही क्षोभ अंतरतम का ताप बनकर सदियों से जल रहे
होम की ज्वाला - सा, हृदय अस्थियों के लहू से सिंचित होकर
असफलता का अवलंब लेकर बढता चला जाता है और
एक दिन यह ताप प्रचंड ज्वाल बन अनुकूल हवा को पाकर
फूस के छप्पर की तरह , मानव को जलाकर राख कर देता है
फल रहे अंतर्दाह की इस लालिमा में
मानव वाणीहीन तमिस्त्रग्रस्त दीखता है
उदधि लहरियों सा लोट रहा दीखता है
नभ नील गरल –सा दीखता है
धरा संचित तम की छाया - सी दीखती है
तल - अतल , तलातल , भूतल चतुर्दिक
उद्ग्रीव भुजंगिनियों से भरा दीखता है
कहते हैं, कर्मयग्य से सभी दुख दूर हो जाते हैं
और कर्म ही पूण्यता की उत्तम सीढी भी होती है
जो आत्मत्याग और उत्सर्ग हेतु तत्पर रहते हैं
वही मनुज मृत्यु को पग-पग पर ठुकरा सकते हैं
इस मनोदाह में आत्मदाह तो होता है, पर न तो
छाले पड़ते हैं, न ही कोई धुआँ उठता है
पर इस कर्मयग्य का, विधि - विधान क्या होगा
केवल तर्क के स्पर्शकरों से,क्या इसकी प्राप्ति हो सकती है
शिशिर कणों पर सो रही, इस आशा की भ्रांति का
आखिर कैसे होगा सुखमय नितांत ,जिसकी
छाया तक करती है, मनुज हृदय को कौतुहल कांत
कहते हैं , यह ताप जब उदग्र बन उड़ता सर्पिनी -सा
तब प्रिय की ममता, पुत्र का मोह् कुछ नहीं भाता
पैरों के नीचे धरा नहीं होती, चतुर्दिक शून्य रहता
पर जिस दिन हम जान पायेंगे सुंदर किसे कहते हैं, उसी दिन्
कह सकेंगे, प्राणी हित के लिए प्राणी क्यों मरते हैं

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