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शिविर में शिशु / विष्णु खरे

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CHANDER


शिविर में शिशु

एक चादर पर पन्द्रह शिशु लिटाए गए हैं
वे उन पैंतालीस में से एक हैं
जो दंगों के बाद मे इन कुछ हफ़्तों में
एक राहत शिविर में पैदा हुए हैं

पिछले कुछ बरसों से तुम जली हुई
फ़र्श पर गिरी या रखी हुई लाशों की तस्वीरें ही देखते आए हो
इधर लगभग हर हफ़्ते देखते हो
और हालात ऐसे हैं कि उनकी तादाद और भयावहता इतनी बढ़ जाए
कि उनके फ़ोटो न लिए जा सकें
और उनमें शायद इस अनाम छायाकार के साथ-साथ
तुम सरीखे देखनेवाले की लाशें भी हों

तस्वीरें और भी हैं
सिर से पैर तक जली हुई बच्ची की
जिसकी दो सहमी हुई आँखें ही दिख रही हैं पट्टीयों के बीच से
अपने घर के मलबे में बैठी शून्य में ताकती माँ-बेटी की
जान बचा लेने की भीख माँगते घिरे हुए लोगों की

लेकिन अभी तो तुम्हारे सामने ये पंद्रह बच्चे हैं

और ये औरतें जो इनकी माँ बुआ नानी दादी हो सकती हैं
या कोई रिश्तेदार नहीं महज़ औरतें
जो इन्हे घेरकर खड़ी हुई हैं या उकड़ूँ बैठी हुई हैं
इनके चेहरों पर वह कोमलता देखो वह खुशी वह हल्का-सा गर्व
और उसमें जो गहरा दुख मिला हुआ है
उसके साथ तुम भी वह खुशी महसूस करो और थर्रा जाओ

देखो वे सारे शिशु कितने ख़ुश हैं वे मुस्करा रहे हैं
उन औरतों को सिर्फ़ देखकर या पहचान कर
या उनके प्यार-भरे सम्बोधन सुनकर
नन्हे हाथ कुछ उठे हुए छोटे-छोटे पाँव कुछ मुड़े हुए
साफ़ है वे गोदी में आना चाहते हैं

उन्हे पता नहीं है जिस घर और कुनबे के वे हैं
उनके साथ क्या हुआ है
और तुम यह कह नहीं सकते कि उनके पिता ज़िन्दा ही हों
या घर के दूसरे मर्द
या कि उन्हे जनम देने के बाद उनकी माँएँ भी बची या नहीं

चूँकि ये एक मुस्लिम राहत शिविर में पैदा हुए हैं
इसीलिए इन्हे मुसलमान शिशु कहा जा सकता है
वर्ना इस फ़ोटो से पता नहीं चल पा रहा है
कि ये किसकी सन्तान हैं
28 फरवरी को ऐसा फ़ोटो यदि गोधरा स्टेशन पर लिया जा सकता
तो ये हिन्दु माने जाते
क्योंकि इन औरतों के चेहरों और पहनावे से
हिन्दु-मुसलमान की शनाख़्त नहीं हो पा रही है

इस देश में उन तस्वीरों की क़िल्लत कभी नहीं होगी
जो तुम्हारा कलेजा चाक़ कर दें
शर्मिन्दा और ज़र्द कर दें तुम्हें
तुम्हारे सोचने कहने महसूस करने की व्यर्थता का एहसास दिलाती रहें
लेकिन फ़िलहाल तुम्हारे सामने ये पन्द्रह मुस्कराते बच्चे हैं
जिनका एक भी दाँत अभी आया नहीं है

तुम क्यों इस क़दर ख़ुश और विचलित हो उन्हे देखकर
क्या इसलिए कि वे तुम्हे अपने बच्चों के छुटपन की तस्वीर लगते हैं
या ख़ुद तुम्हारी अपनी पहली फ़ोटो की तरह
जिसमें तुम माँ की गोद में इसी तरह थोड़े हाथ-पैर हिला बैठे थे
या कि फिर उन घिसी-पिटी उक्तियों के मुताबिक सोचकर
कि बच्चों के कोई धर्म सम्प्रदाय जाति वर्ग भाषा संस्कृति नहीं होते
लेकिन तुमने यह भी सोचा कि जिन्होने गोधरा में जलाया व अहमदाबाद में
यदि उनकी भी बचपन या पालने की तस्वीर देखोगे
तो वे भी इतने ही प्यारे लगेंगे और मार्मिक
और कितना विचित्र चमत्कार लगता है तुम्हें
कि राहत शिविर में भी इतने और ऐसे मासूम बच्चे जन्म ले सकते हैं
निहत्थे और अछूते
और ये ऐसे पहले शिशु नहीं हैं
इनसे भी कठिन और अमानवीय हालात में
औरतों और मर्दों को बनाया है बच्चों ने माँ-बाप
बहुत सारी समस्याएँ पैदा करते आए हैं बच्चे
जो बड़े हुए हैं और भी कहर बरपा करते हुए
लेकिन इन्सानियत भी तभी रहती आ पाई है

इस तस्वीर के इन पन्द्रह बच्चों में लेकिन ऐसा क्या है
कि लगता है दीवानावार पहुँच जाऊँ इनके पास
कोई ऐसी अगली गाड़ी पकड़कर जिसके जलाए जाने की कोई वजह न हो
इनकी माँओं के सामने चुपचाप खड़ा रहूँ गुनहगार
गान्धारी के सामने किसी नखजले विजेता के हिमायती की तरह
क्या ले जाऊँ इन बच्चों को उठाकर सौंप दूँ हिन्दुओं को
और बदले में ऐसे ही बच्चे हिन्दुओं में बाँट दूँ इनमें
या ऐसे तमाम बच्चों को गड्डमड्ड कर दूँ
और बुलाऊँ लोगों को उनमें हिन्दू-मुसलमान पहचानने के लिए
लेकिन ऐसी भावुक असम्भव ख़तरनाक हरकतें बहुत सोची गई हैं
और उससे बहुत हो नहीं पाया है
लेकिन क्या करूँ कैसे बचाऊँ इन शिशुओं को
किसी जलते हुए डिब्बे फुँकते हुए घर धधकते हुए मुहल्ले में
पाई जानेवाली अगली झुलसी हुई लाशें बनने से
जिनके हाथ-पैर इन्ही की तरह मुड़े हुए होते हैं
मानो उठा लेने को कह रहे हों या दुआ माँग रहे हों

क्या इन बच्चों से कहूँ बच्चो बड़े होकर उस वहशियत से बचो
जो हममें थी बचो हमारी नफ़रतों हमारे बुग़्ज़ हमारी जहालतों से बचो
यदि तुम्हें नफ़रत करनी ही है तो हम जैसों से करो
और उस सबसे जिसने हमें वैसा ही बना डाला था
तुम्हे अगर इंतक़ाम लेना ही है तो हम सरीखों से लो
जिनसे तुम सरीखे बचाए नहीं जा सके थे

लेकिन यह सब क्या पहले नहीं कहा जा चुका है

फिर भी फिर भी यह हर बार कहा जाना ही चाहिए
इन बच्चों को सिर्फ़ बचाना ही ज़रूरी नहीं है
वह खुशी कैसे बचे वह मुस्कान कैसे
जो अभी फ़कत अपने आसपास महज़ इन्सानों को देख इनके चेहरों पर है
और नामुमकिन उम्मीदें जगाती है
कितना भी तार-तार क्यों न लगे यह
लेकिन हाँ ये उम्मीद हैं हमारे भविष्य-जैसी किसी चीज़ की
हाँ इन्हे देखकर फिर वह पस्त जज़्बा उभरता है आदमी को बचाने का
हाँ यक़ीन दिलाते-से लगते हैं कि इन्हे देखकर जो ममता जागती है
अन्ततः शायद वही बचा पाएगी इन्हे और हमें
सब बताया जाए इन्हे क्योंकि वैसे भी ये उसे जान लेंगे
यह उन पर छोड़ दिया जाए कि वे क्या तय करते हैं फिर
उन्हे बचाएँ क्योंकि एक दिन शायद इन्हीं में से कुछ बचाएँगे
अपनों को हम जैसों को और उस सबको जो बचाने लायक है
और शायद बनाएँगे वह
जो मिटा दिया जाता है जला दिया जाता है फिर भी बार-बार बनता है
जनमता हुआ

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