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शैलेन्द्र चौहान का जन्म खरगौन में 1957 ई. में हुआ। शिक्षा : प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा विदिशा जिले के ग्रामीण भाग में प्राप्त करने के पश्चात बी.ई. (इलेक्ट्रिकल) विदिशा से की। लेखन : लेखन विद्यार्थी काल से ही आरम्भ कर दिया था। पहले कविताओं और कहानियों की रचना की और फिर बाद में आलोचना में हाथ आजमाए। वैज्ञानिक, शैक्षिक, सामाजिक एवं राजनैतिक लेखन भी किया। सभी स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं। प्रकाशन : निम्नलिखित पुस्तकें शैलेन्द्र चौहान ने लिखीं:- कविता संग्रह : ’नौ रुपये बीस पैसे के लिए’ 1983 में प्रकाशित, ’श्वेतपत्र’ दो दशकों के अंतराल के बाद 2002 में, ’और कितने प्रकाश वर्ष’ 2003में, ’ईश्वर की चौखट पर’ 2004 में। कहानी संग्रह : ’नहीं यह कोई कहानी नहीं’ 1996 में प्रकाशित, कथा, संस्मरणात्मक उपन्यास (पाँव जमीन पर) एवं आलोचना पुस्तक तैयार। ’सदी के आखरी दौर में’ कविता संग्रह के बारह कवियों में से एक संपादन : ’धरती’ अनियतकालिक साहित्यिक पत्रिका, जिसके अंक चर्चित रहे, श्री रामवृक्ष बेनीपुरी पर ’सामान्य जन संदेश’ का बहुचर्चित विशेषांक संपादित, सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी कुंदनलाल गुप्त, शिव वर्मा एवं अमर शहीद महावीर सिंह की संक्षिप्त परिचयात्मक जीवनियाँ। एक निबन्ध संग्रह ’संस्कृति और समाज’, विकल्प की ओर से प्रकाश्य अन्य : ’अभिव्यक्ति’, ’प्ररेणा’ और ’सामान्य जन संदेश’ पत्रिकाओं में संपादन सहयोग। पुरस्कार : पुरस्कारों, सम्मानों एवं जोड़-जुगाड़ से नितांत परहेज़। अन्य : सामाजिक, सांस्कृतिक गतिविधियों में लगातार सक्रियता।

परिवेश सम्मान - 2007 Edit

साहित्यिक पत्रिका परिवेश द्वारा प्रतिवर्ष किसी रचनाकार को दिया जाने वाला चौदहवाँ परिवेश सम्मान वर्ष 2007 के लिए कवि-आलोचक शैलेंद्र चौहान को देने का निर्णय लिया गया है। परिवेश सम्मान की घोषणा करते हुए परिवेश के सम्पादक मूलचंद गौतम एवं महेश राही ने कहा कि हिन्दी में तमाम तरह के पुरस्कारों एवं सम्मानों के बीच इस सम्मान का अपना वैशिष्टय है। परिवेश के 53वें अंक में शैलेंद्र चौहान के साहित्यिक अवदान पर विशेष सामग्री केद्रिंत की जायेगी। 1957 में मध्यप्रदेश के खरगौन में जन्मे श्री शैलेंद्र चौहान को कविता विरासत के बजाय आत्मान्वेषण और आत्मभिव्यक्ति के संघर्ष के दौरान मिली है। निरन्तर सजग होते आत्मबोध ने उनकी रचनाशीलता को प्रखरता और सोद्देश्यता से संपन्न किया है। इसी कारण कविता उनके लिए संपूर्ण सामाजिकता और दायित्व की तलाश है। विचार, विवेक और बोध उनकी कविता के अतिरिक्त गुण हैं। जब कविता और कला आधुनिकता की होड़ में निरन्तर अमूर्त होती जा रही हो, ऐसे में शैलेंद्र चौहान समाज के हाशिए पर पड़े लोगों के दु:ख तकलीफों को, उनके चेहरों पर पढ़ने की कोशिश करते हैं। शैलेन्द्र चौहान को दिया जाने वाला 2007 का परिवेश सम्मान इसी अनुभव और सजग मानवीय प्रतिबध्दता का सम्मान है।

पूर्वोत्तर भारत की हिंदी पत्रिका 'आपका तिस्ता-हिमालय’ अमरावती सृजन-पुरस्कार 2015 शैलेंद्र चौहान को Edit

सिलीगुड़ी से प्रकाशित पूर्वोत्तर भारत की चर्चित हिंदी मासिक पत्रिका 'आपका तिस्ता-हिमालय’ की तरफ से 28 फरवरी को सिलीगुड़ी के बर्द्धवान रोड स्थित ऋषि भवन में अमरावती सृजन पुरस्कार एवं सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। 'आपका तिस्ता-हिमालय’ के प्रधान संपादक डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह ने अमरावती सृजन-पुरस्कार व सम्मानों की भूमिका रखते हुए देश में पुरस्कार वितरण के बारे में कहा कि पूर्वोत्तर की एक मात्र हिंदी मासिक पत्रिका आपका तिस्ता-हिमालय की ओर से दिये जा रहे इन पुरस्कार एवं सम्मानों के बारे में हम यहां साफतौर पर बताना आवश्यक समझते हैं कि यह पहल हमने विशेष प्रयोजन से शुरू की है। आप जानते हैं कि आजकल पुरस्कार व सम्मान देने का एक मंतव्य प्रेरित चलन प्रारंभ हुआ है। सत्ता एवं पूंजी के भ्रमजाल तथा प्रायोजित सम्मानों के बरक्स तिस्ता-हिमालय द्वारा दिये जा रहे ये सम्मान इससे बिल्कुल इतर जन-सामाजिक सरोकारों तथा जन-संघर्ष के लिए प्रतिबद्ध साहित्यकर्मी एवं नागरिक दायित्व के निष्ठापूर्ण निर्वाहन के लिए हैं जिसे हम बखूबी कर पा रहे हैं। ऐसे सम्मान उन्हीं लोगों को दिया जाना चाहिए जो देश व समाज की बेहतरी प्रतिबद्ध हैं। वर्ष 2015 के लिए यह पुरष्कार हिंदी के ख्यातनाम कवि, चिंतक  एवं पत्रकार शैलेन्द्र चौहान को को देने का निर्णय कविता एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए लिया गया है। शैलेन्द्र चौहान को सिलीगुड़ी महाविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के प्रो. अभिजित मजूमदार, साहित्यकार डॉ. भीखी प्रसाद 'वीरेन्द्र’ एवं नवगीतकार बुद्धिनाथ मिश्र द्बारा सम्मानित किया गया। अपने संबोधन में शैलेन्द्र चौहान ने कहा कि पत्रकारिता एवं सृजनशील साहित्य की रचना में अन्य लोग भी सक्रिय हैं। यह सम्मान दरअसल उन्हें मिलना चाहिए था। लेकिन वे विनम्रतापूर्वक इस सम्मान को स्वीकार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि लेखक व पत्रकारों को समाज व राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्ध रहते हुए गरीब व वंचित वर्ग के हित में रचनाधर्मिता निभानी चाहिए। मुनाफाखोरी की तेजी से बढ़ रही प्रवृत्ति के बीच समाज का जिस तेजी से ध्रुवीकरण हो रहा है वह चिंतनीय है। हमारी सहनशील संस्कृति की राष्ट्रीय पहचान आज कठिन परीक्षा की घड़ी से गुजर रही है। हमें सामुदायिक सरोकारों पर अधिक बात करने की आवश्यकता है। मेरी कविता और पत्रकारिता भारतीय जनमानस के सुख-दुख, संघर्ष और सांस्कृतिक रुचि को सहज रूप में अभिव्यक्त करने का उपक्रम है।

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