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सदस्य:Hemendrakumarrai

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आदरणीय अनिल जी,

अभी कुछ दिनों पूर्व आपने मुक्तिबोध के कविता संग्रह "चाँद का मुँह टेढ़ा है" में संपादन करते हुए 'चाँद' पर से

चंद्रबिंदु हटा कर चांद कर दिया है। राजकमल द्वारा प्रकाशित संग्रह में इसे "चाँद का मुँह टेढ़ा है" ही लिखा गया है। मैं

प्रायः कविता संग्रह में प्रकाशित पाठ के अनुरूप ही कविताएँ टंकित कर काव्यकोश में डालता हूँ।

वैसे सही-ग़लत क्या है आप मुझसे ज़्यादा जानते होंगे, क्योंकि मेरा हिन्दी के व्याकरण का अध्ययन नहीं के बराबर

है। काव्यकोश के वर्तनी संबंधी दिशा निर्देशों में भी चाँद पर चंद्रबिंदु ही लगाने का उल्लेख है। मुझे भी लगता है कि

यदि चाँद से ही चंद्रबिंदु छीन लिया जाएगा तो वह बेचारा कहाँ जाएगा। उचित मार्ग दर्शन की अपेक्षा है।--Hemendrakumarrai ११:५५, १८ जनवरी २००८ (UTC)

आदरणीय हेमेन्द्र जी, मैंने जो भी परिवर्तन किए हैं, उचित ही किए हैं । जहाँ भी 'न' की ध्वनि निकलेगी वहाँ चंद्रबिन्दु नहीं लगेगा । जैसे इसी शब्द 'चंद्रबिन्दु' में स्वयं आपने भी चन्द्रबिन्दु नहीं लगाया है जबकि यह शब्द भी उसी तथाकथित 'चाँद' से बना है । दरअसल हम हिन्दी वाले अभी तक यह नहीं समझ पाए हैं कि चन्द्रबिन्दु कहाँ लगेगा और बिन्दु कहाँ लगेगा । हिन्दी के बड़े-बड़े विद्वानों की पुस्तकों में इस तरह की ग़लतियाँ वे विद्वान नहीं करते बल्कि प्रकाशकों को यहाँ बैठे वे प्रूफ़रीडर करते हैं जो आधी-अधूरी भाषा जानते हैं । इन्हीं लोगों के कारण 'साँस' शब्द 'सांस' हो जाता है । सीधी सी बात है, जहाँ ध्वनि नासिका-ध्वनि होगा,सिर्फ़ वहीं चंद्रबिन्दु लगेगा । अन्य स्थानों पर जहाँ अर्ध 'न' की ध्वनि निकलती है, बिन्दु लगेगा यानि जिन शब्दों को हम आधे 'न' के साथ लिख सकते हैं वहाँ बिन्दु लगेगा । जैसे चान्द=चांद , सिन्धु=सिंधु,बन्दर=बंदर, कन्चा=कंचा, आदि । लेकिन जहाँ ध्वनि नासिकाध्वनि है, वहाँ चन्द्रबिन्दु लगेगा जैसे साँस, माँस, बाँस, फाँस,पाँच,पाँख,आँख, चाँटा,आँच, आँचल,टाँका, साँवरिया आदि । 'पंख' को पँख नहीं लिखना चाहिए और 'पँखुरी' को पंखुरी नहीं लिखना चाहिए। हम हिन्दी वालों ने अपने अज्ञान से और कुछ कम्प्यूटर-कृपा से भाषा की हत्या करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है । हिन्दी उच्चारण के अनुरूप लिखी जाने वाली भाषा है । परन्तु हमें हिन्दी लिखना-पढ़ना सिखाया ही नहीं जाता । या फिर बचपन से ही अधकचरे अध्यापक हमारे पल्ले पड़ते हैं,जो हमारे उच्चारण को बचपन से ही भ्रष्ट कर देते हैं । मेरी छोटी बहन का उच्चारण बेहद ख़राब है । वह हिन्दी का एक वाक्य लिखने में पाँच ग़लतियाँ करती है, लेकिन वह दिल्ली के एक स्कूल में हिन्दी पी.जी.टी. है । मैं हमेशा उसे टोकता हूँ और वह मुस्करा कर बात को टाल देती है और न तो अपने उच्चारण को सुधारना चाहती है, न भाषा को । उसमें हिन्दी के प्रति कोई लगाव ही नहीं है, बस हिन्दी उसके लिए कमाई या आय का साधन है । ऎसा ही प्रकाशकों के यहाँ बैठे प्रूफ़रीडरों के साथ होता है । हिन्दी में आज तक कोई वर्तनी-कोश भी नहीं बना है, जबकि आज उसकी बहुत ज़रूरत है । कैसे हैं आप ? अपना ई-मेल पता लिख रहा हूँ-- कृपया समय निकाल कर लिखें । आपके साथ नियमित सम्पर्क में रहकर अच्छा लगेगा । aniljanvijay@gmail.com सादर अनिल जनविजय

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