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रचनाकार: लावण्या शाह

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अन्तर मनसे उपजी मधुर रागिनीयों सा,
होता है दम्पतियों का सुभग संसार ,
परस्पर, प्रीत, सदा सत्कार, हो साकार,
कुल वैभव से सिंचित, सुसंस्कार !
तब होता नहीँ, दूषित जीवन का,
कोई भी, लघु - गुरु, व्यवहार...

नहीं उठती दारुण व्यथा हृदय में,
बँधते हैं प्राणो से तब प्राण !
कौन देता नाम शिशु को ?
कौन भरता सौरभ भंडार ?
कौन सीखलाता रीत जगत की ?
कौन पढाता दुर्गम ये पाठ?

माता और पिता दोनों हैँ,
एक यान के दो आधार,
जिससे चलता रहता है,
जीवन का ये कारोबार !
सभी व्यवस्था पूर्ण रही तो,
स्वर्ग ना होगा क्या सँसार ?

ये धरती है इंसानों की,
नहीँ दिव्य, सारे उपचार!
एक दिया,सौ दीप जलाये,
प्रण लो, करो,आज,पुकार!
बदलेंगें हम, बदलेगा जग,
नहीं रहेंगे, हम लाचार!
कोरी बातों से नहीं सजेगा,
ये अपने सपनों का संसार।

आवागमन ( written : 4 th Dec. 1974 ) २०:१९, १ दिसम्बर २००७ (UTC)२०:१९, १ दिसम्बर २००७ (UTC)२०:१९, १ दिसम्बर २००७ (UTC)२०:१९, १ दिसम्बर २००७ (UTC)२०:१९, १ दिसम्बर २००७ (UTC)२०:१९, १ दिसम्बर २००७ (UTC)२०:१९, १ दिसम्बर २००७ (UTC)२०:१९, १ दिसम्बर २००७ (UTC)२०:१९, १ दिसम्बर २००७ (UTC)208.102.209.199 २०:१९, १ दिसम्बर २००७ (UTC) चलो मेरे मन बाल रवि तुम, तुम्हे नवेली उषा लिवाने आई ! जागो , निकलो, घर के बाहर, हो चुकी तारोँ की बिदाई ! लाख सात सौ, तारक बहनेँ सजा हवेली, चाँद ने ब्याह कराईँ धरती के सूने आँगन पे उढने की, अब बारी तुम्हारी आई ! तुम हो नन्हे, अभी शिशु से, लाज गाल पे पथराई धीरे चढना, कुछ पल रूकना, कहे आम की अमराई ! देखो दूर सुदूर गाँव मेँ फैली भोर की अरुणाई जीवन के सूने प्राँगण मेँ, शक्ति जीवन की मुस्काई ! वह किसान , ले हल निकाल, जा करने को रहा जुताई, बैलोँके खुर की जुगल जोडी से, छम ~ छम बाजी पुरवाई ! ना शरमाना,देखो उपरसे, दुनिया काम से गहमाई, वह माँ है, जो जुटी कर्म मेँ, ड्योढी जिसकी हर्षाई ! बालक उसका तुझे देखकर, पकडे तेरी, गरमाई, छोटा रवि मेरा, उठ गया तू, क्या, कडी धूप रे बरसाई ! आह ! अब न कहूँ शिशु, बाल न मेरा फूटी तेरी तरुणाई, हाय ! कुँलाचेँ भर, दौड कर, गया दिन ! - बजी अब शहनाई ! सज गया साँझ से ब्याह रचाने, हो गई, प्रेम की भरपाई ! कर ब्याह सुँदरी साँझसे, गया, रही मैँ ही प्यासी -- छिप गया ओट मेँ रात की, ना हुई , मेरे मन की चाही, रात रात भर बहे जो आँसू, श्यामा, रात तारोँ से रतनाई ! ना दिखा मुझे तू, बाल ~ रवि, या, पौरुष वह, साँध्य ,जिसकी गदराई, कर दिया प्रकाशित, चँद्र दिवा भी, फिर भी, शाँति ही हाथ आई ! सब खोज तेरी जब व्यर्थ हुई तब, खिली चमेली कँपाई, थके नयन ज्योँही, मूँदे मैँने, प्राची से तभी आवाज आई ... " माँ क्या सो गईँ तुम ? जागो, मुझे लिवाने, उषा आई ! " " छलने मेँ माहिर मेरा बेटा ! " कह माँ धरती, मुस्काई !

--लावण्या

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