पुराने अवतरण Report a problem
पन्ना बदलें संवाद

सरजमीं से मुखातिब न होती/रमा द्विवेदी

From Hindi Literature

यहां जाईयें: नेविगेशन, ख़ोज

कविता कोश की स्थापना के दो वर्ष पूरे!   दो वर्ष की उपलब्धियाँ    |     रचनाकारों की टिप्पणियाँ    |     अपनी टिप्पणी दीजिये


 रचनाकार: रमा द्विवेदी                 

ये लंबे-मोटे-पतले पेड
कुछ हरे-भरे,कुछ में है पतझड
इन पेडों की ऊंचाई देख कर
मैं सोचती हूं
कितने वर्षों से ये पेड
ऐसे ही खडे हैं ऊर्ध्वमुखी
मुस्कराते,गुनगुनाते हुए
इनका हाल कोई पूछता नहीं
फिर भी कैसे जीवित हैं ये?
मैं इनकी ओर देखती हूं एकटक
और सोचती हूं
इन्हें जीवन-शक्ति मिलती है कहां से?
शायद अपनी सरजमीं से?
हां ऐसा ही है।

विदेश में अकेलापन मुझे ही
क्यों कचोटता है?
गैरों की सरजमीं पर-
अपनी जडें जमाना
लोहे के चने चबाने जैसा है
या फिर निर्जीव बनकर जीना है
अपना देश, अपने लोग
अपने देश की आबोहवा
अपने देश की मिट्टी की सुगंध
बहुत कचोटती है मन को
पेड बनकर जीना कितना सहज है?
काश! मैं भी एक पेड बन जाती
तब मुझे भी किसी से
शिकायत न होती
मोहब्बत न होती,तो यह तडपन न होती
अगर मैं अपनी सरजमीं से मुखातिब न होती॥

Rate this article:

Share this article:

Hubs Highlights International Sites Wikia messages
Entertainment
Gaming
Cartoons & Comics
Science Fiction
Hobbies
Sports
See all...
German
Spanish
Chinese
Japanese
More...
Wikia is hiring for several open positions
Send this article to a friend
"सरजमीं से मुखातिब न होती/रमा द्विवेदी"
 
 
Hi!

I thought you'd like this page from Wikia!

http://hi.literature.wikia.com

Come check it out!
Send confirmation


.