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साँस लेना भी सज़ा लगता है / अहमद नदीम क़ासमी

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CHANDER

साँस लेना भी सज़ा लगता है

अब तो मरना भी रवा लगता है


कोहे-ग़म पर से जो देखूँ,तो मुझे

दश्त, आगोशे-फ़ना लगता है


सरे-बाज़ार है यारों की तलाश

जो गुज़रता है ख़फ़ा लगता है


मौसमे-गुल में सरे-शाखे़-गुलाब

शोला भड़के तो वजा लगता है


मुस्कराता है जो उस आलम में

ब-ख़ुदा मुझ को ख़ुदा लगता है


इतना मानूस हूँ सन्नाटे से

कोई बोले तो बुरा लगता है


उनसे मिलकर भी न काफूर हुआ

दर्द ये सबसे जुदा लगता है


इस क़दर तुंद है रफ़्तारे-हयात

वक़्त भी रिश्ता बपा लगता है


रवा=ठीक; कोहे-ग़म=ग़म के पहाड़; दश्त=जंगल; आगोशे-फ़ना=मौत का आगोश; मौसमे-गुल=बहार का मौसम; सरे-शाख़े-गुलाब= गुलाब की डाली पर; ब-ख़ुदा= ख़ुदा के लिए; काफूर=गायब होना; तुंद=प्रचण्ड; रफ़्तारे-हयात=जीवन की गति; बपा= पर बंधा पंछी जो उड़ न पाए ।

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