Entertainment
 

साकेत / मैथिलीशरण गुप्त / प्रथम सर्ग / पृष्ठ २

विकिपीडिया, एक मुक्त ज्ञानकोष से

http://www.kavitakosh.org

































CHANDER

स्वर्ग की तुलना उचित ही है यहां,
किंतु सुरसरिता कहां, सरयू कहां?
वह मरों को मात्र पार उतारती,
यह यहीं से जीवितों को तारती!
अंगराग पुरांगनाओं के धुले,
रंग देकर नीर में जो हैं धुले,
दीखते उनसे विचित्र तरंग हैं,
कोटि शक्र-शरास होते भंग हैं।
है बनी साकेत नगरी नागरी,
और सात्विक-भाव से सरयू भरी।
पुण्य की प्रत्यक्ष धारा वह रही।
तीर पर हैं देव-मंदिर सोहते,
भावुकों के भाव मन को मोहते।
आस-पास लगी वहां फुलवारियां,
हंस रही हैं खिलखिला कर क्यारियां।

है अयोध्या अवनि की अमरावती,
इंद्र हैं दशरथ विदित वीरव्रती,
वैजयंत विशाल उनके धाम हैं,
और नंदन वन बने आराम हैं।

एक तरु के विविध सुमनों-से खिले,
पौरजन रहते परस्पर हैं मिले।
स्वस्थ, शिक्षित, शिष्ट उद्योगी सभी,
बाह्यभोगी, आंतरिक योगी सभी।
व्याधि की बाधा नहीं तन के लिए,
आधि की शंका नहीं मन के लिए।
चोर की चिंता नहीं धन के लिए,
सर्व सुख हैं प्राप्त जीवन के लिए।
एक भी आंगन नहीं ऐसा यहां,
शिशु न करते हों कलित-क्रीड़ा जहां।
कौन है ऐसा अभाग गृह कहो,
साथ जिसके अश्व-गोशाला न हो?
धान्य-धन-परिपूर्ण सबके धाम हैं,
रंगशाला-से सजे अभिराम हैं।
नागरों की पात्रता, नव नव कला,
क्यों न दे आनंद लोकोत्तर भला?
ठाठ है सर्वत्र घर या घाट है,
लोक-लक्ष्मी की विलक्षण हाट है।
सिक्त, शिश्चित-पूर्ण मार्ग अकाट्य है,
घर सुघर नेपथ्य, बाहर नाट्य है!

अलग रहती हैं सदा ही ईतियां,
भटकती हैं शून्य में ही भीतियां।
नीतियों के साथ रहती रीतियां,
पूर्ण हैं राजा-प्रजा की प्रीतियां।
पुत्र रूपी चार फल पाए यहं,
भूप को अब और कुछ पाना नहीं।
बस यही संकल्प पूरा एक हो,
शीघ्र ही श्रीराम का अभिषेक हो।

सूर्य का यद्यपि नहीं आना हुआ;
किंतु समझो, रात का जाना हुआ।
क्योंकि उसके अंग पीले पड़ चले;
रम्य-रत्नाभरण ढीले पड़ चले।
एक राज्य न हो, बहुत से हों जहां,
राष्ट्र का बल बिखर जाता है वहां।
बहुत तारे थे, अंधेरा कब मिटा।
सूर्य का आना सुना जब, तब मिटा।
नींद के भी पैर हैं कंपने लगे, देखलो,
लोचन-कुमुद झंपने लगे।
वेष-भूषा साज ऊषा आ गई,
मुख-कमल पर मुस्कराहट छा गई।
पक्षियों की चहचहाहट हो उठी,
स्वप्न के जो रंग थे वे घुल उठे,
प्राणियों के नेत्र कुछ कुछ खुल उठे।
दीप-कुल की ज्योति निष्प्रभ हो निरी,
रह गई अब एक घेरे में घिरी।
किंतु दिनकर आ रहा, क्या सोच है?
उचित ही गुरुजन-निकट संकोच है।
हिम-कणों ने है जिसे शीतल किया,
और सौरभ ने जिसे नव बल दिया,
प्रेम से पागल पवन चलने लगा,
सुमन-रज सर्वांग में मलने लगा!
प्यार से अंचल पसार हरा-भरा,
तारकाएं खींच लाई है धरा।
v

निरख रत्न हरे गए निज कोष के,
शून्य रंग दिखा रहा है रोष के।
ठौर ठौर प्रभातियां होने लगीं,
अलसता की ग्लानियां धोने लगीं।
कौन भैरव-राग कहता है इसे,
श्रुति-पुटों से प्राण पीते हैं जिसे?
दीखते थे रंग जो धूमिल अभी,
हो गए हैं अब यथायथ वे सभी।
सूर्य के रथ में अरुण हय जुत गए,
लोक के घर-वार ज्यों लिप-पुत गए।
सजग जन-जीवन उठा विश्रांत हो,
मरण जिसको देख जड़-सा भ्रांत हो।
दधिविलोडन, शास्त्रमंथन सब कहीं,
पुलक-पूरित तृप्त तन-मन सब कहीं,
खुल गया प्राची दिशा का द्वार है,
गगन-सागर में उठा क्या ज्वार है!
पूर्व के ही भाग्य का यह भाग है,
या नियति का राग-पूर्ण सुहाग है!
अरुण-पट पहने हुए आह्लाद में,
कौन यह बाला खड़ी प्रसाद में ?
प्रकट-मूरतिमती उषा ही तो नहीं?
कांति-की किरणें उजेला कर रहीं।
यह सजीव स्वर्ण की प्रतिमा नई,
आप विधि के हाथ से ढाली गई।
कनक-लतिका भी कमल-सी कोमला,
धन्य है उस कल्प-शिल्पी की कला!
जान पड़ता नेत्र देख बड़े-बड़े-
हीरकों में गोल नीलम हैं जड़े।

साकेत / मैथिलीशरण गुप्त / प्रथम सर्ग / पृष्ठ ३