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सार हो तुम / नागार्जुन

कौन हो तुम

अग्निगर्भित इंगितों में

अति-मुखर हो, मौन हो तुम !

प्रबल बड़वानल संजोये --

उर-उदधि में, कौन हो तुम?

मौन हो तुम

सार हो तुम

अवनि की अकुलाहटों के !

तार हो तुम,

संत बुनकर के पटों के !

सेतु हो,

दोनों तटों के !

नागार्जुन

८।१०।८२