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हज़ारों ख़्वाइशें ऐसी कि हर ख़्वाइश पे दम निकले / ग़ालिब

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लेखक: sanjay kumar dwivedi

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हज़ारों ख़्वाहिशें सी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले

भरम खुल जाय ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुरपेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले

मगर लिखवाये कोई उसको ख़त तो हमसे लिखवाये
हुई सुबह और घर से कान पर रख कर क़लम निकले

हुई इस दौर में मंसूब मुझसे बादा-आशामी
फिर आया वो ज़माना जो जहाँ से जाम-ए-जम निकले

हुई जिनसे तवक़्क़ो ख़स्तगी की दाद पाने की
वो हमसे भी ज़ियादा ख़स्ता-ए-तेग़-ए-सितम निकले

मुहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

ज़रा कर जोर सीने पर कि तीर-ए-पुरसितम निकले
जो वो निकले तो दिल निकले जो दिल निकले तो दम निकले

ख़ुदा के वास्ते पर्दा न काबे से उठा ज़ालिम
कहीं ऐसा न हो याँ भी वही काफ़िर सनम निकले

कहाँ मैख़ाने क दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था के हम निकले


Sanjay Kumar Dwivedi

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