हम पढ़ रहे थे / शहरयार
From Hindi Literature
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रचनाकार: शहरयार | |
हम पढ़ रहे थे ख्वाब के पुर्जो को जोड़ के
आँधी ने ये तिलस्म भी रख डाला तोड़ के
आग़ाज क्यों किया था सफ़र उन ख्वाबों का
पछता रहे हो सब्ज़ ज़मीनों का छोड़ के
इक बूंद ज़हर के लिए फैला रहे हो हाथ
देखो कभी ख़ुद अपने बदन को निचोड़ के
कुछ भी नहीं जो ख्वाब की तरह दिखाई दे
कोई नहीं जो हम को जगाए झिंझोड़ के
इन पानियों से कोई सलामत नहीं गया
है वक्त अब भी किश्तयां ले जाओ मोड़ के
