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होती है तेरे नाम से वहशत कभी कभी / नासिर काज़मी

From Hindi Literature

यहां जाईयें: नेविगेशन, ख़ोज
 

 रचनाकार: नासिर काज़मी                 

होती है तेरे नाम से वहशत कभी कभी
बरहम हुई है यूँ भी तबीयत कभी कभी

ऐ दिल किसे नसीब ये तौफ़ीक़-ए-इज़्तिराब
मिलती है ज़िन्दगी में ये राहत कभी कभी

तेरे करम से ऐ अलम-ए-हुस्न-ए-आफ़रीन
दिल बन गया है दोस्त की ख़िल्वत कभी कभी

दिल को कहाँ नसीब ये तौफ़ीक़-ए-इज़्तिराब
मिलती है ज़िन्दगी में ये राहत कभी कभी

जोश-ए-जुनूँ में दर्द की तुग़यानियों के साथ
अश्कों में ढल गई तेरी सूरत कभी कभी

तेरे क़रीब रह के भी दिल मुतमईन न था
गुज़री है मुझ पे भी ये क़यामत कभी कभी

कुछ अपना होश था न तुम्हारा ख़यल था
यूँ भी गुज़र गई शब-ए-फ़ुर्क़त कभी कभी

ऐ दोस्त हम ने तर्क-ए-मुहब्बत के बावजूद
महसूस की है तेरी ज़रूरत कभी कभी

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