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पीता था मदहोश मदिरा आदत से जो मजबूर था ... मगर प्रेम पुजारी होने का खुद पे इतना गरूर था ... कि देखा नही प्रस्तर है या शबनम की जलती ज्वाला, उसके दिल का दानव इतना क्रूर था ... कि गम के गर्त में गिरे शराबी को लोचन लपट से जिन्दा जला डाला, जरा सोचो उस मीठी झील में नमक जरूर था .... कि ऊपर से चखकर लगादी छलांग, ज्योंही लगा जख्म पर नमक, तो अश्कों ने बेबस कह ही डाला, कि बस तेरा तेरा तेरा सरूर था .........