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  • Kavi Deepak Sharma


    समाज की दुर्दशा और आवाम खामोश ..बड़ी हैरत की बात है ..लेकिन ये सब मुमकिन है ,यहाँ सब कुछ हो सकता है .ये हिंदुस्तान है मेरे भाई. सब्जीवाला अगर एक आलू कम तौल दे तो सब्जी काटने वाले चाक़ू से ही उसका क़त्ल हो जाता है और उसके परिवार वालों को चोर खानदान कह दिया जाता है. गली से घर वालों का निकलना मुश्किल हो जाता है. हर चलता फिरता ताने और तंज़ कसता जाता है. मानो इस आदमी में समाज का बेडा गर्क कर दिया और देश को इससे अपूर्णीय क्षति हुई है....दो आलू किसी का घर बर्बाद करने के लिए काफी हैं और क़त्ल करने वाला बहुत गर्व से ,सीना चौड़ा कर कहता है ...मैं असत्य बर्दाश्त नहीं कर सकता ...समाज में चोर नहीं पैदा होने चाहिए ....मैंने जिंदगी में कभी कोई भी गलत काम नहीं क्या और गलत देख कर मेरा खून खौल उठता है..मुझे अपने किये पर कोई अफ़सोस नहीं है...(शायद एक नेता…

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  • Kavi Deepak Sharma

    Aurat...........Meri Ek Ghazal" Deepak Sharma"

    अप्रैल २८, २०१२ by Kavi Deepak Sharma

    उमर के साथ साथ किरदार बदलता रहा शख्सियत औरत ही रही , प्यार बदलता रहा .

    बेटी ,बहिन ,बीबी , माँ , ना जाने क्या क्या चेहरा औरत का दहर हर बार बदलता रहा .

    हालात ख्वादिनों के न सदी कोई बदल पाई बस सदियाँ गुज़रती रहीं ,संसार बदलता रहा .

    प्यार ,चाहत ,इश्क ,राहत ,माशूक और हयात मायने एक ही रहे ,मर्द बस बात बदलता रहा .

    किसी का बार कोई इंसान नहीं उठा सकता यहाँ पर कोंख में जिस्म पलकर आकार बदलता रहा .

    सियासत ,बज़ारत,तिज़ारत या फिर कभी हुकूमत औरत बिकती रही चुपचाप , बाज़ार बदलता रहा .

    कब तलक बातों से दिल बहलाओगे "दीपक ”तुम भी करार कोई दे ना सका बस करार बदलता रहा

    -- http://www.kavideepaksharma.com

    Umar ke saath saath kirdaar badaldta raha Shakhsiyat Aurat hi rahi, pyaar bada…

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